झांसी। महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज के 60 डॉक्टर नॉन प्रैक्टिस एलाउंस (एनपीए) ले रहे हैं। इनमें से अधिकांश सरकारी डॉक्टर प्राइवेट प्रैक्टिस में लिप्त होकर अपनी दुकानें चला रहे हैं। इसके बावजूद न तो प्रशासन और न ही शासन किसी प्रकार की कार्रवाई में दिलचस्पी दिखा रहा है।
शासन द्वारा लगातार मेडिकल कॉलेज के सरकारी चिकित्सकों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर कार्रवाई की चेतावनी जारी की जाती रही है। मुख्यमंत्री द्वारा मंत्रिमंडल में किए गए नवीन फेरबदल के बाद चिकित्सा-शिक्षा राज्यमंत्री का जिम्मा संभालने वाले राधेश्याम सिंह तो प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाले सरकारी चिकित्सकों को जेल भेजने तक की चेतावनी दे चुके हैं।
बावजूद झांसी में कई चिकित्सक निजी अस्पतालों में या अपने आवास पर प्राइवेट प्रैक्टिस में लिप्त हैं। हाल ही में गायनिक विभाग की महिला चिकित्सक की शिकायत पिछोर निवासी मुदित चिरवरिया ने साक्ष्यों के साथ प्रमुख सचिव चिकित्सा-शिक्षा से कर दी है। वहीं, एक आरटीआई में पता चला है कि मेडिकल कॉलेज के 60 डॉक्टर शासन से मिलने वाला एनपीए ले रहे हैं। एनपीए लेने के बावजूद इनमें से अधिकांश चिकित्सकों की प्राइवेट प्रैक्टिस में संलिप्तता है, मगर प्रशासन द्वारा कार्रवाई न करना कई सवालों को जन्म दे रहा है।
एनपीए से डीए भी बढ़ जाता
एनपीए देने के बावजूद सरकारी डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस करने से सरकार को न सिर्फ एलाउंस के पैसे का नुकसान हो रहा है, बल्कि डीए के रूप में बढ़ने वाले रुपये की भी चोट पहुंच रही है। बताया गया कि बेसिक सैलरी और ग्रेड-पे का 25 फीसदी सरकारी चिकित्सकों को एनपीए मिलता है।
इन तीनों को मिलाकर ही डीए बनता है। इससे स्पष्ट है कि डॉक्टरों के डीए बढ़ाने में एनपीए का भी रोल होता है। वहीं, लेक्चर, एसिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर डॉक्टरों की यह चार पोस्ट होती हैं। इसलिए पद के अनुसार डॉक्टरों को तेरह से पच्चीस हजार तक प्रतिमाह एनपीए मिलता है। इस लिहाज से सरकार सालाना चिकित्सकों को एक लाख छप्पन हजार से तीन लाख रुपये एनपीए दे रही है।