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Jhansi News: नेहरू से अनबन के बाद केंद्र की राजनीति छोड़ आए थे धुलेकर

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- बाद में छह साल रहे थे विधान परिषद के सभापति
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फोटो रघुनाथ विनायक धुलेकर
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से अनबन के बाद झांसी के पहले सांसद आचार्य रघुनाथ विनायक धुलेकर ने केंद्र की राजनीति को अलविदा कह दिया था। इसके बाद उन्होंने प्रदेश की सियासत की ओर अपना रुख कर लिया था। वह छह साल तक विधान परिषद के सभापति रहे। इसके बाद उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया था।
सन 1952 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर आचार्य रघुनाथ विनायक धुलेकर झांसी के पहले सांसद बने थे। महाराष्ट्रीयन परिवार से होने के बावजूद वह हिंदी के प्रबल पक्षधर थे और उनकी बोलचाल की भाषा हिंदी ही थी। संसद भवन में पहुंचने के बाद उन्होंने हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिलाने के लिए अपना पक्ष रखना शुरू कर दिया था। लेकिन, तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू उनसे इत्तेफाक नहीं रखते थे। इसी बीच एक बार वह संसद में हिंदी में बोल रहे थे, परंतु जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें टोक दिया था। नेहरू का कहना था कि संसद में अलग-अलग भाषाओं को जानने वाले बैठे हुए हैं, यदि आप अपनी बात अंग्रेजी में रखें तो सभी को समझ में आ जाएगी। इसके बाद धुलेकर ने अंग्रेजी में ही नहीं, बल्कि मराठी, गुजराती, उड़िया, बंगाली समेत दस भाषाओं में अपनी बात रखी थी। संसद में मौजूद सभी लोग उन्हें अलग-अलग भाषाओं में बोलते हुए देखकर हतप्रभ थे। अंत में धुलेकर ने कहा था कि उन्हें दस भाषाओं का ज्ञान हैं, परंतु भारत को जोड़ने वाली भाषा हिंदी ही है, जिसे राजभाषा बनाया जाना चाहिए। इसे लेकर नेहरू और धुलेकर के रिश्तों में खटास आ गई थी। इसी का नतीजा था कि 1957 के चुनाव में उनका टिकट काट दिया गया था और उनकी जगह कांग्रेस ने डा. सुशीला नैयर को प्रत्याशी बनाया था। जबकि, धुलेकर से केंद्र की राजनीति में लंबी पारी खेलने की उम्मीद जताई जा रही थी। आजादी के आंदोलन में उनकी बड़ी भूमिका रही भी। इसके अलावा वे उच्चकोटि के अधिवक्ता भी थे। समाचार पत्रों का भी उन्होंने प्रकाशन किया था। उनकी इन्हीं खूबियों के चलते उन्हें संविधान सभा का सदस्य भी बनाया गया था। लेकिन, वह दूसरी बार संसद में नहीं पहुंच सके। इसके बाद वह 1958 से 1964 तक उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सभापति रहे। ये कार्यकाल पूरा करने के बाद उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया था और अपना पूरा ध्यान लेखन में लगा दिया था।
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आचार्य धुलेकर हिंदी के प्रबल पक्षधर थे। वह संसद के पहले ही कार्यकाल में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिलाना चाहते थे। इसी को लेकर उनके तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू से रिश्ते खराब हो गए थे, जिससे कांग्रेस ने उन्हें लोकसभा का दूसरा चुनाव नहीं लड़ाया था। जबकि, तब धुलेकर से केंद्र की राजनीति में लंबी पारी खेलने की उम्मीद जताई जा रही थी। - हरगोविंद कुशवाहा, उपाध्यक्ष - अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान
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महाराष्ट्रीय परिवार में पले-बढ़े होने के बाद भी कक्का धुलेकर की पहचान हिंदी के प्रबल पक्षधर के रूप में थी। वह हिंदी को देश को एक सूत्र में बांधने वाली भाषा मानते थे। उनका यह रुख नेहरू जी को पसंद नहीं था। इसी का नतीजा था कि दूसरे चुनाव में उन्हें लोकसभा का टिकट नहीं दिया गया था। इसके बाद छह साल वह विधानसभा परिषद के सभापति रहे और बाद में उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया था। - निरंजन धुलेकर, आचार्य धुलेकर के पौत्र
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