फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Jhansi News: देसी छड़ी बन रही विदेशियों का सहारा, लंदन-मॉरीशस के दृष्टिहीन भी कर रहे इसकी मांग

विज्ञापन
विज्ञापन

विज्ञापन

अमर उजाला ब्यूरो



झांसी। झांसी के सुमित शर्मा और उनके दोस्त तरुण पाल की बनाई हुई छड़ी अक्षण अब लंदन और मॉरीशस के लोगों का भी सहारा बन गई है। वहां लोगाें ने उनसे संपर्क कर बड़ी संख्या में उनका उपकरण खरीदा है। इसके साथ ही यूपी, एमपी, राजस्थान समेत कई राज्यों में लोग उनसे संपर्क कर एल्युमिनियम से बनी अक्षण डिवाइस ऑनलाइन मंगवा रहे हैं।

ये है उपकरण की खासियत

उपकरण में सेंसर और जीपीएस लगा है, ऐसे में जब भी कोई दृष्टिहीन व्यक्ति इसका उपयोग करके चलता है तो चार फीट की दूरी पर कोई सामान या व्यक्ति खड़ा होने पर छड़ी आवाज करने लगती है। इसके बाद भी अगर वह वस्तु सामने से नहीं हटती है और दृष्टिहीन के पास आने पर दो फीट की दूरी पर कंपन करना शुरू कर देगी। इससे युवक को पता चल जाएगा कि यह वस्तु ठोस है, जिससे वह टकराने से बच जाएगा। वहीं, रात में अगर युवक छड़ी लेकर निकलता है तो सात फीट की दूरी पर मौजूद गाड़ी, वस्तु या व्यक्ति को देखकर लाइट जलना शुरू हो जाएगी। जिससे सामने वाले व्यक्ति को पता चल जाएगा कि कोई दिव्यांग सामने से आ रहा है।
विज्ञापन




ऐसे काम करता है उपकरण



छड़ी में कंपन, आवाज, लाइट सिस्टम, लाइव लोकेशन जैसे फीचर दिए गए हैं। इनकी मदद से जब दिव्यांग चलता है तो उनको पहले ही आसपास की हलचल के बारे में पता चल जाता है, इससे दिव्यांगों को आसानी होती है। इससे वह अपनी सुरक्षा कर सकते हैं और खोने पर लाइव लोकेशन भेजकर भी परिजनों को बता सकते हैं।

अबतक 500 दृष्टिहीनों को मुफ्त दिलवा चुके छड़ी



सुमित का कहना है कि कंपनियों के पास सीएसआर फंड होता है, वह उनसे संपर्क कर अपनी डिवाइस को जरूरतमंदों तक पहुंचाते हैं। इसके माध्यम से 2021 से अबतक वह 500 लोगों को मुफ्त छड़ी वितरित कर चुके हैं।
विज्ञापन


जेब खर्च से शुरुआत, खड़ी कर दी 25 लाख की कंपनी



2021 में कोरोना काल में जब सुमित उदयपुर में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे, तब वह अपने दोस्त के साथ समाजसेवा से जुड़े कार्य भी करते थे। ऐसे में उनके सामने रोजाना दृष्टिहीन लोग सड़क पार करते थे, जिनको सड़क पार करने में काफी परेशानी होती थी। तब उनके दिमाग में उनकी समस्या का समाधान ढूंढने की बात आई, उन्होंने दिव्यांगाें के आश्रम और स्कूल में जाकर उनकी समस्या को बारीकी से समझा। तब जाकर उन्होंने डिवाइस बनाने के लिए जेब खर्च महज दो हजार रुपये से शुरुआत की। आज उनकी कंपनी कुल 25 लाख रुपये की हो गई है।दे
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें