झांसी। एक ओर समाज में पढ़ी-लिखी महिलाएं अपने हुनर से खुद आगे बढ़ रहीं और दूसरों के लिए सुनहरे रास्ते बना रही हैं, वहीं दूसरी ओर दिन भर मेहनत मजदूरी करने वाली महिलाएं भी किसी मिसाल से कम नहीं हैं। इंद्रानगर, आईटीआई स्थित बस्ती, पॉलिटेक्निक की टोरिया, हसारी और आवास विकास में बिल्डिंगों और बस्तियों में मजदूरी करने वाली इन महिलाओं का कहना है कि रोजी-रोटी के लिए उन्हें दिनभर पसीना बहाना पड़ता है। वो भले ही खुद पढ़ी-लिखी नहीं हैं लेकिन अपने बच्चों को पढ़ा रही हैं। अपने परिवार की परंपरा के अनुसार वह घूंघट में भी काम कर रही हैं ताकि आज उनके नाजुक हाथों पर पड़े छाले कल उनके बच्चों को सुनहरा भविष्य दे सकें। सिर पर पल्लू लिए ये महिलाएं पुरुषों से पीछे नहीं हैं।
पहले घर का चूल्हा-चौका करते हैं, इसके बाद रोजी-रोटी के लिए मजदूरी पर निकलना पड़ता है। - मीरा
सिलबट्टा आदि पत्थर का सामान बनाने में पति की मदद करती हूं, पति इन्हें बेचने के लिए फेरी लगाते हैं। - त्रिवेणी
परिवार और बच्चों के खातिर मजदूरी करके ही अपना गुजारा करना पड़ता है। - रामसखी
हम खुद तो पढ़े-लिखे हैं नहीं, कोई ज्यादा खेती भी नहीं हैं, इसलिए मजदूरी करके घर चला रहे हैं। - फूला
पति मिस्त्री हैं और मैं, मजदूरी करती हूं, महंगाई के इस दौर में मिलकर गृहस्थी चला रहे हैं। - पिंकी
सिलबट्टा और चकिया बनाकर बेचते हैं, इसी से घर चला लेते हैं। बच्चे भी पढ़ लेते हैं। - पूजा