झांसी। कृषि की दृष्टि से साल 2015 बेहद दर्दनाक साबित हुआ। साल की शुरुआत में रबी सीजन पर मौसम का कहर टूटा, तो अंत में खरीफ की फसल को कुदरत ने तबाह किया। फसल खराब होने के सदमे से चालीस से अधिक किसानों की सांसे थम गईं।
साल 2015 की शुरुआती दिनों में रबी सीजन में गेहूं व दलहन के अच्छे उत्पादन की उम्मीद जताई जा रही थी। खेतों में फसलें लहलहा रहीं थीं और मौसम भी मेहरबान था। लेकिन, एकाएक कुदरत का मिजाज पलट गया। फरवरी माह में जिला अतिवृष्टि व ओलावृष्टि की चपेट में आ गया। फसलें तबाह हो गईं और जिले में हाहाकार मच गया। राजस्व अमले ने तीन अरब छप्पन करोड़ पचास लाख रुपये के नुकसान का आकलन किया।
गांव-गांव से फसल खराब होने के सदमे से किसानों की मौत की खबरें आने लगीं। दाने-दाने को मोहताज तीन दर्जन किसानों ने दम तोड़ा। हालांकि, जिला आकांक्षा समिति ने इकतीस कृषक परिवारों को एक-एक लाख रुपये की फौरी राहत दी। बाद में मुख्यमंत्री ने सत्रह परिवारों को सात-सात लाख रुपये की सरकारी मदद उपलब्ध कराई।
खैर किसी तरह से समय गुजरा और खरीफ सीजन आया। मेहनतकशों ने एक बार फिर खेतों में अपना पसीना बहाया, लेकिन इस बार फिर बदकिस्मती आड़े आ गई। खेतों की सूखी मिट्टी नमी के लिए तरसती रही, लेकिन बारिश नहीं हुई। मूंग व उड़द की फसल बुरी तरह से बर्बाद हो गई। मूंगफली के दाने भी सिकुड़ गए। तिल ने जरूर थोड़ी राहत दी। यह सदमा भी किसानों पर भारी गुजरा। खरीफ फसल के बर्बाद होने के सदमे से आठ किसानों की जान गई।
2016 भी नहीं भर पाएगा जख्म
झांसी। साल 2015 किसानों को ऐसे जख्म दे गया, जिसे भर पाना साल 2016 में भी संभव नहीं हो पाएगा। बारिश न होने से जिले के चालीस फीसदी खेतों में इस रबी सीजन की बुआई नहीं हो पाई। खेत सूने पड़े हुए हैं। जहां फसल बोई भी गई है, तो वहां भी स्थिति ठीक नहीं है। ऐसे में अगले साल के शुरुआत में भी किसानों के हाथ ज्यादा कुछ आने वाला नहीं है।
अन्नदाताओं को रहा मदद का इंतजार
झांसी। किसानों का साल 2015 मदद के इंतजार में गुजरा। रबी सीजन में तीन अरब छप्पन करोड़ पचास लाख रुपये का नुकसान हुआ, जिसका कई किस्तों में अब तक दो अरब अठहत्तर करोड़ पैंतीस लाख रुपये ही मुआवजा बंट पाया। खरीफ सीजन में फसलों को अड़सठ करोड़ का नुकसान हुआ। लेकिन, अब तक किसानों के हाथ एक पाई नहीं आई है। साल भर मुआवजा के लिए धरना-प्रदर्शन का दौर जारी रहा। राज्य सरकार व केंद्र सरकार के नुमाइंदों के बीच आरोप प्रत्यारोप का दौर चलता रहा। दोनों ही किसानों की सहायता में एक-दूसरे पर पीछे हटने का आरोप लगाते रहे।