झांसी। आज जमाना काफी बदल गया है। बेटियां बेटों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। अब जब बेटी चांद पर कदम रख चुकी है फिर भला क्यों भेदभाव किया जा रहा है। बेटी पैदा होने पर भी घर में जश्न होना चाहिए। पढ़े लिखे वर्ग के लोग ऐसा करते भी हैं लेकिन अशिक्षित और जागरूकता के अभाव में लोग बेटा-बेटी में अंतर कर रहे हैं। जो सरासर गलत है। बेटियों को अच्छी शिक्षा देकर परिजन उस मुकाम पर पहुंचा सकते हैं, जिस सीढ़ी पर कोई बेटा पहुंच सकता है। समाज में कई ऐसे उदाहरण भी हैं, जिसने साबित किया है कि बेटियां रह क्षेत्र में अपना और देश का नाम रोशन कर रही हैं। यह कहना है कि शहर की जागरूक महिला अधिकारियों का।
वर्षों पुरानी कुरीतियों में अभी बहुत बदलाव नहीं आया है। आखिर क्यों लोगों में बेटियों को लेकर असुरक्षा की भावना रहती है? एक बेटे की चाहत में सात बेटियां तक पैदा कर देते हैं। जबकि, आज बेटियों कहीं भी बेटों से पीछे नहीं हैं। वह आगे बढ़ रही हैं। अच्छे मुकाम पर पहुंचकर परिवार और देश का नाम बढ़ा रही हैं। - डॉ. सविता दुबे, सेवानिवृत्त एडी हेल्थ।
कम पढ़े लिखे, रूढ़िवादी विचारधारा के लोग अभी भी बेटा-बेटियों में भेदभाव कर रहे हैं। हालांकि, पहले से सोच में काफी बदलाव आया है। चाहें बेटा पैदा हो या बेटी अच्छी शिक्षा देकर उन्हें आगे बढ़ाया जा सकता है। ऐसे में बच्चों को शिक्षित करने पर परिजनों का पूरा जोर रहना चाहिए। बेटा-बेटी में अंतर करने पर नहीं। - डॉ. संजया शर्मा, वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ।
आज रूढ़िवादी सोच का कोई अस्तित्व नहीं होना चाहिए। पहले लड़कियां सिर्फ घर में रहकर काम करती थीं, इसलिए बोझ लगती थीं लेकिन आज खुद कमा रही हैं। समाज में दहेज की मांग भी कम हुई है। लड़कियां लड़कों की तुलना में परिजनों का सहयोग भी काफी करती हैं। ऐसे में बेटा-बेटी में भेदभाव नहीं होना चाहिए। - डॉ. शिकाफा जाफरीन, मनोचिकित्सक।
जमाना काफी बदल गया है। अब पढ़े लिखे लोगों के लिए बेटा और बेटी में कोई अंतर नहीं है। सिर्फ अशिक्षित और जागरूकता का अभाव वाले लोग ही बेटा-बेटी में भेदभाव करते हैं। बेटी हमेशा मां-बाप का साथ ज्यादा देती है। ऐसे में पढ़े-लिखे लोगों को बेटा-बेटी में अंतर करने वालों को जागरूक करने की जरूरत है। - मंजू शर्मा, उप क्रीड़ाधिकारी।