झांसी। छेड़छाड़, यौन शोषण, दुष्कर्म की शिकार बेटियाें को डरने और दबने की जरूरत नहीं है। मुखर होकर दोषियों को सबक सिखाने और उनके कर्मों की सजा दिलाने वक्त है। वरिष्ठ अधिवक्ताओं के अनुसार महिलाओं को सुरक्षा दिलाने के लिए तमाम नियम-कानून हैं। घर, स्कूल, कॉलेज, ऑफिस, समाज के हर कोने में उन्हें सुरक्षित रखने की व्यवस्था है। जरूरत इन कानूनों के प्रति जागरूक होने और इनका सदुपयोग करने की है। पढ़ाई छोड़ना, घर में बंद रहना समाधान नहीं है। दोषियों को आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है।
नाबालिग पीड़ितों के लिए पॉक्सो एक्ट कारगर हथियार
जिला अधिवक्ता संघ के सचिव प्रणय श्रीवास्तव के अनुसार यौन शोषण की शिकार नाबालिग बेटियों की रक्षा के लिए पॉक्सो एक्ट कारगर कानून है। दोष सिद्ध होने पर अपराधी को आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है। दुष्कर्म के लिए भी धारा 376 के तहत सख्त दंड की व्यवस्था है। अपराध आम आदमी ने किया है, सरकारी अफसर ने, नियोक्ता ने या फिर सामूहिक दुष्कर्म। कोर्ट अपराधी को सबक सिखाने के लिए कानून के कड़े प्रावधानों का उपयोग करता है। सजा तीन, पांच, दस या बीस साल तक हो सकती है। गैंगरेप के दोषियों को आजीवन सजा तक का प्रावधान है। कोई भी पीड़ित या उसका परिजन उनसे या एसोसिएशन से कभी भी संपर्क कर सकता है। हर जायज मामले में पूरी कानूनी मदद दी जाएगी।
65 फीसदी मामलों में दोषियों को मिल रही सजा
जिला अधिवक्ता संघ के सचिव के अनुसार यौन शोषण के जो मामले जिला कोर्ट तक पहुंच रहे हैं, इनमें 60 से 65 फीसदी मामलों में दोषियों को सजा मिल रही है। पांच वर्ष पहले तक यह आंकड़ा 40 फीसदी था। अब कोर्ट और अधिवक्ता इन अपराधों के प्रति अधिक सख्त और सजग हुए हैं। जिन मामलों में सजा नहीं होती उनमें अधिकतर या तो राजीनामा हो जाता है या पैरवी कमजोर रह जाती है।
आत्महत्या नहीं, मामला उजागर करें सबक सिखाएं
अधिवक्ता साधना सिंह ने कहा समझ नहीं आता कि पीड़ित बेटियां आत्महत्या क्यों कर लेती हैं। क्या इस तरह मर जाना समस्या का समाधान है। इसमें बेटियों का क्या दोष है। गलत अपराधी करते हैं सजा बेटी और उसके घर वाले क्यों भुगतें। पूरे आत्मविश्वास के साथ मामलों का उठाना चाहिए। ताकि अपराधियों की सामाजिक छवि धूमिल हो और वे जेल में चक्की चलाएं। परिजनों और समाज को भी नजरिया बदलना होगा। समाज, लोकलाज का दबाव ही उन्हें भयभीत करता है।
हालात से भागें नहीं, मुकाबला करें बदलेगा माहौल
बीकेडी में समाजशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. जितेंद्र तिवारी के अनुसार पीड़ित, उसके परिजन और समाज को चुप होकर नहीं बैठना चाहिए। यह अपराधियों के हौसले बुलंद करता है। दोबारा कोई बड़ा अपराध करते हैं। महिलाएं हालात से भागना बंद करें। नहीं तो महिला सशक्तीकरण की बड़ी-बड़ी बातें सेमीनार का हिस्सा ही रहेंगी, हकीकत नहीं। मुकाबला करें, हेल्पलाइन नंबर, कानून अपने अधिकारों का उपयोग करें और अपराधियों को सलाखों के पीछे पहुंचवाएं। समाज भी पीड़ितों का साथ दे, माहौल बदलेगा।
ये भी हैं कानून
कार्यक्षेत्र में यौन शोषण की रोकथाम के लिए कानून: द सेक्सुअल हरैसमेंट एट दि वर्कप्लेस (प्रीवेंशन, प्रोहिबिशन एंड रिड्रेसल) एक्ट 2013
इसके तहत बिना किसी की सहमति के शारीरिक संबंध बनाना या उससे इस तरह की मांग करना, अश्लील टिप्पणी, कोई भी अश्लील इशारा, आचरण, बोलचाल भी दंडनीय है। नौकरी या प्रोन्नति के लिए शारीरिक संबंध की मांग या किसी को नौकरी से निकालने की धमकी देते हुए उससे इस तरह की मांग करना, किसी महिला के कार्यक्षेत्र में अनावश्यक हस्तक्षेप कर उसे शारीरिक संबंध बनाने के लिए दबाव बनाना कानून की नजरों में अपराध है।
इंडियन पीनल कोड (आईपीसी) के तहत
- धारा 354 (ए) के तहत किसी आदमी द्वारा महिला की इच्छा के विरुद्ध शारीरिक संबंध बनाने का दबाव, अश्लील वीडियो दिखाना, यौन आचरण संबंधी टिप्पणी अपराध माना जाता है। इसके तहत तीन वर्ष तक के सश्रम कारावास तक की सजा का प्रावधान है।
- धारा 209 के तहत किसी सार्वजनिक स्थान पर अश्लील गाने गाना भी तीन माह की सजा या अर्थदंड या दोनों रूप से दंडनीय है।
- धारा 209 के तहत किसी महिला की गरिमा को आहत करने वाले कृत्य करना भी दंडनीय है। इसके तहत एक साल की सजा, अर्थदंड या दोनों का प्रावधान है। यहां तक की किसी महिला को मस्त भी नहीं का जा सकता।
- द इनडीसेंट रिप्रजेंटेशन ऑफ वूमेन (प्रोहिबिशन) एक्ट (1987)
किसी महिला की भावनाओं को अश्लील सामग्री वाले चित्र, पेंटिंग, फिल्म, पैम्फलेट के जरिए आहत करना भी दंडनीय है। इसके लिए दो वर्ष तक के कारावास का दंड दिया जा सकता है