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दांव पर जिंदगी, तलवार की धार पर नौकरी और करते रहे सैंपलिंग

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झांसी। कोरोना संक्रमण जब चरम पर था, तब बड़ी संख्या में लोगों की मौत हो रही थी। हालात ये थे कि लोग परिजनाें के अंतिम संस्कार तक में शामिल नहीं हो रहे थे। उस दौरान कुछ हजार रुपये महीने की पगार पर प्राइवेट पैथोलॉजी में नौकरी करने वाले गुमनाम टेक्नीशियन संक्रमण की चिंता किए बगैर दिन- रात महानगर की सड़कों पर जगह-जगह सैंपल ले रहे थे। यह सिलसिला आज भी जारी है।
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इनमें कई की तो नौकरी चली गई, क्योंकि ये लोग काम प्रशासन के लिए कर रहे थे और वेतन प्राइवेट लैब से मिल रहा था। कोरोना महामारी के हाहाकार में इनका दर्द दबकर रह गया। पहले सरकार की तरफ से चाय व बिस्कुट मिल जाता था, अब कई महीनों से वह भी बंद हो गया है। प्राइवेट नौकरी पर तलवार बदस्तूर लटकी हुई है। कुछ लोगों को सरकार की तरफ से नाममात्र का मानदेय मिल रहा है, वह भी सिर्फ उन्हें जिनका डूडा में पंजीकरण है। तमाम दुश्वारियों के बीच ये बिना किसी विशेष सम्मान या लालच के कोरोना से लड़ाई लड़ रहे हैं।
लोग लड़ने और मारने- पीटने पर आमादा हो जाते थे
बुधवार को मेडिकल कॉलेज में सैंपलिंग कर रहे अशोक कुमार बोले, सही पूछिए तो शुरू में डर लगता था। लोग संक्रमित हो रहे थे, मर रहे थे। जहां आम लोगों को जाने की मनाही थी हम लोगों को तो उन्हीं हॉट स्पॉट और कनटेनमेंट जोन में जाना पड़ता था। सैंपल लेने के दौरान कई बार लोग लड़ने, मारने- पीटने, गाली-गलौज पर आमादा हो जाते थे। बाद में अहसास होने लगा कि संकट की इस घड़ी में अगर हम लोग भी मुंह मोड़ लेंगे तो कोरोना से जंग कैसे जीतेंगे। हमारी लड़ाई अभी भी जारी है। प्रतिदिन टीबी हॉस्पिटल से हमारी ड्यूटी तय होती है। इन दिनों 30-40 टीम लगी हुई हैं।
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सम्मान मिले न मिले, क्या फर्क पड़ता है
लैब टेक्नीशियन शैलेंद्र गौतम ने बताया पिछले आठ महीने से जहां भी ड्यूटी लग रही है, महानगर के कोने- कोने में जाकर सैंपलिंग कर रहा हूं। शुरू में घर वालों को बहुत डर लगता था। कहते थे कि लगातार कनटेनमेंट जोन में घूमता हूं, कहीं संक्रमण न हो जाए। ऐसी नौकरी से क्या फायदा। फिर मैंने उन्हें समझाया कि जो भी यह काम करेगा वह किसी का बेटा या भाई तो होगा। खतरा उसको भी रहेगा। यह मेरा पेशा है। मुसीबत की घड़ी में, मैं कैसे मुंह मोड़ सकता हूं। जितनी सामर्थ्य है, लड़ाई जारी रहेगी। सम्मान या पहचान मिले न मिले, इससे क्या फर्क पड़ता है।
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