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कर्जदार बना रहा है कोरोना

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झांसी। कोरोना वायरस का संक्रमण सेहत के साथ-साथ जेब पर भी बहुत भारी पड़ रहा है। इलाज में लाखों रुपया पानी की तरह बहाना पड़ रहा है। बावजूद, जान बच जाने की कोई गारंटी नहीं है। हालात ये हैं कि सामान्य मध्यवर्गीय लोगों को इलाज के लिए दूसरों के सामने हाथ फैलाने पड़ रहे हैं। लोग कर्जदार होते जा रहे हैं। झांसी में ही निजी अस्पतालों में इलाज पर लोगों को पांच-पांच लाख रुपये तक खर्च करने पड़ जा रहे हैं। बाहर के अस्पतालों में जाने पर ये खर्च बढ़कर 10 से15 लाख रुपये तक पहुंच रहा है।
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शहर के सराफा व्यापारी जितेंद्र सोनी को कोरोना वायरस के संक्रमण ने अपनी चपेट में ले लिया था। पहले उनका झांसी में ही इलाज किया जाता रहा है, लेकिन हालात कोई सुधार नहीं आया, बल्कि स्थिति गंभीर होने लगी। परिवार के लोग एंबुलेंस के से उन्हें नोएडा के एक बड़े निजी अस्पताल में ले गए, जहां वे 13 दिन भर्ती रहे। अस्पताल को उन्होंने 9.73 लाख का बिल अदा किया। जबकि, इससे पहले वे झांसी में सवा दो लाख रुपये खर्च कर चुके थे। इसके अलावा झांसी से नोएडा से जाने का एंबुलेंस ने 46 हजार रुपये किराया वसूला था। कुल मिलाकर कोरोना वायरस के संक्रमण को मात देने के लिए उन्हें 12.44 लाख रुपये सीधे तौर पर खर्च करने पड़ गए थे। इसके अलावा परिजनों के आने-जाने, नोएडा में रहने का खर्च अलग से आया था। यानी कोरोना वायरस के संक्रमण को मात देने में उन्हें तेरह लाख रुपये से अधिक खर्च करने पड़ गए थे। ऐसे तमाम लोग हैं, जिन्हें कोरोना के इलाज के लिए दस से पंद्रह लाख रुपये खर्च करने पड़ गए। लोगों ने कर्ज लेकर अपनों का इलाज कराया। खासतौर पर मध्यम वर्गीय व निमभन मध्यम वर्गीय मरीज वायरस के जाल से मुक्त होने के बाद वे कर्ज के जंजाल में फंस गए।
केस - 1
इलाज पर छह लाख खर्च के बाद भी मौत
झांसी। एक फाइनेंस कंपनी में कार्यरत गुमनावारा के पास निवासी 44 वर्षीय व्यक्ति का जीवन परिवार समेत सकुशल आगे बढ़ रहा था। अचानक वे कोरोना वायरस के संक्रमण की गिरफ्त में आ गए। पहले घर पर रहकर इलाज किया, लेकिन स्थिति में सुधार नहीं आया तो उन्हें मेडिकल कॉलेज मेें दाखिल कराया गया। दो दिन वे मेडिकल में रहे। इसके बाद परिजनों ने उन्हें एक निजी अस्पताल में भर्ती करा दिया। यहां प्लाज्मा थैरेपी हुई, परंतु हालात में कोई सुधार नहीं आया। पांच दिन आईसीयू में रखा गया। लेकिन, बीमारी लगातार गंभीर रूप धारण करती चली गई। इसके बाद उन्हें वेंटिलेटर पर पहुंचा दिया गया। वेंटिलेटर पर दो दिन रहने के बाद रविवार को उनकी सांसें थम गईं। परिजनों ने उनके इलाज पर छह लाख रुपये खर्च किए। ये पैसा इकट्ठा करने के लिए उन्हें दूसरों के आगे हाथ भी फैलाने पड़े। बावजूद, जिंदगी नहीं बचा पाए।
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केस - 2
मरीज की स्थिति नहीं बताई जाती थी, बताया जाता था बिल
झांसी। बरुआसागर के 45 वर्षीय कारोबारी कोरोना वायरस के संक्रमण की गिरफ्त में आ गए थे। पहले वे घर पर इलाज लेते रहे, लेकिन सुधार नहीं हुआ। ऐसे में वे एक निजी अस्पताल में दाखिल हो गए। परिजनों के मुताबिक अस्पताल में वे खुद चलकर बैग टांगकर पहुंचे थे, लेकिन जब निकले तो चार कंधों की जरूरत पड़ गई। परिजनों ने 40-40 हजार रुपये के चार रेमडेसिविर इंजेक्शन लगवाए थे। पैसा पानी की तरह बहाया था। हालांकि, पैसे की कोई कमी भी नहीं थी। इलाज पर लगभग सात लाख रुपये खर्च किए, लेकिन जान नहीं बचा पाए। परिजनों का कहना है कि निजी अस्पताल वाले मरीज का हाल नहीं बताते थे, केवल बिल बताया जाता था। आईसीयू पर ले जाना हो या वेंटिलेटर पर, एडवांस पैसा जमाया कराया जाता था। बाजार से कुछ मशीनें भी मंगाईं थीं। इतना ही नहीं, मरीज की मौत के बाद उसके पास रखी हुई बीस हजार रुपये की नकदी व अन्य सामान भी गायब मिला।
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