प्राथमिक विद्यालय कन्या उन्नाव गेट का हाल बेहाल है। यहां पांच कक्षाआें की छात्राआें की पढ़ाई और मध्याह्न भोजन तैयार करने के लिए सिर्फ एक ही कमरा है। मुख्यद्वार पर स्थानीय नागरिक कचरा फेंकते हैं। इस कारण गंदगी रहती है।
उन्नाव गेट से ठीक पहले स्थिति इस स्कूल में 64 छात्र - छात्राएं पढ़ते हैं, जिन्हें पढ़ाने की जिम्मेदारी एक शिक्षक और एक शिक्षा मित्र पर है। मध्याह्न भोजन पकाने को दो रसोइया हैं। स्कूल में बिजली नहीं है, क्योंकि एक साल पहले कनेक्शन काट दिया गया। इसलिए पंखे शोपीस बने हैं और आलम यह है कि चिड़ियों ने घोंसला बना लिया है। हैंडपंप खराब पड़ा है। बच्चों को पानी के लिए इधर-उधर घूमना पड़ता है। शिक्षकों व रसोइयों के मुताबिक उन्हें अलग से किचन नहीं है। जिस कक्षा में बच्चे पढ़ते हैं, उसी में खाना पकाना पड़ता है। इनके अनुसार स्कूल में जलभराव होने पर बच्चों को बैठने में काफी मुश्किल होती है। विभाग को कई बार जानकारी दी गई, लेकिन कुछ नहीं हुआ।
हैंडपंप पर दौड़ता है करंट
प्राथमिक विद्यालय कन्या उन्नाव गेट के विद्यार्थियों संजू, कपिल ने बताया कि स्कूल गेट पर लगे ट्रांसफार्मर से कई बार करंट स्कूल के अंदर लगे हैंडपंप पर आता है। यह करंट उन्हें भी लग चुका है। बरसात में तो और परेशानी होती है।
प्राथमिक विद्यालय दतिया गेट की हालत भी अजब है। पढ़ाई के लिए उपयोग हो रहे एकमात्र कमरे की दीवारें चटकीं हैं। कक्ष के नीचे से निकली नाली जाम है। इससे बच्चों व शिक्षिकाओं को बदबू लगातार झेलनी पड़ती है।
दतिया गेट से लगे इस विद्यालय में 30 बच्चे पढ़ने आते हैं, जिन्हें पढ़ाने के लिए एक शिक्षिका व एक शिक्षामित्र तैनात हैं। सभी कक्षायें एकमात्र कमरे में चलती हैं। बरसात में पानी छत पर भर जाता है, जो लगातार टपकता रहता है। बिजली का कनेक्शन नहीं होने से विद्यार्थियों और शिक्षिकाओं दोनों को ही गर्मी का सामना करना पड़ता है। शिक्षिकाओं के मुताबिक बिजली कनेक्शन व पंखे के लिए कई बार विभाग कहा जा चुका है, लेकिन हुआ कुछ नहीं।
मान्यता के मानक भी दरकिनार
प्राइवेट स्कूलों को मान्यता के लिए बेसिक शिक्षा विभाग ने जो मानक बनाए हैं। उसमें प्रत्येक कक्षा के लिए एक कक्ष और स्कूल भवन के कक्ष का औसत आकार 180 वर्ग फीट का होना, हेडमास्टर और शिक्षकों के लिए अलग कक्ष और भवन का नेशनल बिल्डिंग कोड 2005 के अनुरूप होने का प्रमाण पत्र लगाना प्रमुख है। अग्निशमन यंत्र, पुस्तकालय, विज्ञान व खेल सामग्री की व्यवस्थायें भी प्राइवेट स्कूल को मान्यता से पहले करनी पड़ती है। अब सरकारी स्कूलों की हालत देखें तो क्या एक भी शर्त बेसिक शिक्षा विभाग पूरी करता है।
इतनी धनराशि देता है शासन
शासन प्रत्येक स्कूल प्रबंध समिति को धनराशि आवंटित करता है। इनमें रंगाई- पुताई के लिए 5000 रुपये, विकास अनुदान प्राथमिक में 5000 रुपये और उच्च प्राथमिक में 7,000 रुपये है। यूनीफार्म प्रति छात्र 400 रुपये, शौचालय निर्माण को 70,000 रुपसे, किचन शेड को 85,000 रुपये देता है। इसके अलावा टीएलएम प्रति अध्यापक 500 रुपये है। वहीं, कई स्कूलों में अतिरिक्त कक्षा कक्ष के निर्माण हुए हैं। इनमें प्रत्येक पर 3,72,000 रुपये खर्च हुए हैं। नये प्राथमिक स्कूल में भवन निर्माण को 9.75 लाख रुपये और जूनियर में 18,59,000 रुपये खर्च हुए हैं। कई शिक्षकों का कहना है कि रंगाई पुताई सहित कई काम के लिए आने वाली धनराशि न तो पर्याप्त होती है और न ही समय से आती है। ऐसे में शिक्षकों को अपनी जेब से खर्च करना पड़ता है।
शासन-प्रशासन है जिम्मेदार
जनपद में कई विद्यालय ऐसे हैं, जिनमें पानी और बिजली की सुविधायें नहीं हैं। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी भी नहीं है। एक शिक्षक चार - चार कक्षायें चलाने को विवश है। सभी अव्यवस्थाओं के लिए शासन-प्रशासन जिम्मेदार है।
- जितेंद्र दीक्षित, शिक्षक नेता उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ
गलत रिपोर्ट दी जा रही है शासन को
जिले में कई विद्यालय ऐसे हैं, जो गिरने की कगार पर हैं। इनके बारे में शिक्षक कई बार लिख कर दे चुके हैं। यहां तक की ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री के पोर्टल पर भी इसकी शिकायतें दी हैं। इसके बाद भी विभाग गलत रिपोर्ट शासन को दे रहा है।
- डा. अचल सिंह, जिलाध्यक्ष विशिष्ट बीटीसी शिक्षक वेलफेयर एसोसिएशन
भूमि नहीं है विद्यालयों के पास
शहर क्षेत्र में विद्यालयों के लिए भूमि नहीं है। इस कारण नए विद्यालय बन नहीं पा रहे हैं। मजबूरी में कुछ स्कूल एक कक्षा में चलाने पड़ रहे हैं। यह समस्या काफी समय से है।
- सुनील कुमार, नगर शिक्षाधिकारी