फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Jhansi News: 89 साल से पुस्तक प्रेमियों का तीर्थ बना हुआ है चिरगांव का पुस्तकालय

विज्ञापन
विज्ञापन
- पुस्तक प्रेमियों का अब भी बना रहता है आवागमन
विज्ञापन

राजेंद्र जैन
चिरगांव। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की धरा चिरगांव में 89 साल पहले पुस्तकालय की स्थापना हुई थी। पुस्तकालय में छह हजार से अधिक पुस्तकें मौजूद हैं। खासतौर पर बुंदेली साहित्य का अनुपम संग्रह यहां उपलब्ध है। यही वजह है कि आज के दौर में भी यहां पुस्तक प्रेमियों का लगातार आवागमन बना रहता है। शोध छात्र भी यहां अपनी जिज्ञासाओं के समाधान के लिए पहुंचते हैं और घंटों किताबों के साथ समय बताते हैं।
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की कर्मभूमि होने की वजह से झांसी के चिरगांव कस्बे को साहित्य का तीर्थ माना जाता है। इस छोटे से कस्बे का पुस्तकों से पुराना नाता रहा है। यही वजह है कि यहां सन 1936 में गणेश शंकर ह्रदय तीर्थ पुस्तकालय की स्थापना की गई थी। पुस्तकालय का शिलान्यास करने पूर्व प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू चिरगांव पहुंचे थे। जबकि, इससे पहले सन 1919 में चिरगांव में साहित्य सदन व साहित्य प्रेस की स्थापना की गई थी। साहित्य प्रेस में हिंदी साहित्य की कई महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन किया गया था। इन पुस्तकों का दुर्लभ संग्रह भी चिरगांव के पुस्तकालय में उपलब्ध है। अपने अनूठे संग्रह की वजह से आज के डिजिटल युग में भी पुस्तकालय में पुस्तक प्रेमियों का लगातार आवागमन बना रहता है।हालांकि, पूर्व के वर्षों के मुकाबले पाठकों की संख्या में कमी आई है। इसके अलावा देश के कई विश्वविद्यालयों के शोधार्थी छात्र भी चिरगांव के पुस्तकालय में समय-समय पर पहुंचते रहते हैं। (संवाद)
विज्ञापन

0000
पुस्तकालय में छह-सात हजार पुस्तकों का अनूठा संग्रह मौजूद है। यही वजह है कि यहां लगातार पुस्तक प्रेमियों का आवागमन बना रहता है। खासतौर पर पुस्तकालय में बुंदेली साहित्य का अनुपम संग्रह मौजूद है। - रविशंकर योगी, पुस्तकालय संचालक
00
फोटो-22chi_2_22042025_167.jpg
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की साहित्य की विरासत को चिरगांव में आज भी सहेजकर रखा गया है। यहां बने पुस्तकालय में साहित्य का संरक्षण और संवर्धन किया जा रहा है। यही वजह है कि पुस्तक प्रेमी व शोधार्थियों के केंद्र में पुस्तकालय रहता है। - डॉ. प्रीति जैन, प्रधानाचार्य-राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त विद्यापीठ इंटर कॉलेज, चिरगांव
00
फोटो-22chi_3_22042025_167.jpg
चिरगांव में साल 1919 में साहित्य सदन व साहित्य प्रेस की स्थापना की गई थी, जिनके द्वारा हिंदी साहित्य की कई महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन हुआ। इन पुस्तकों का अद्वितीय संग्रह पुस्तकालय में आज भी मौजूद है। - रामप्रकाश गुप्ता, साहित्यकार
विज्ञापन

00
फोटो-22chi_1_22042025_167.jpg
पुस्तकों का अपना अलग महत्व है। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि पांडुलिपियों पर लिखे ज्ञान को हम आज ऑनलाइन करने में जुटे हुए हैं। पुस्तकें कल्पनाओं को उड़ान देती हैं, जो कंप्यूटर से संभव नहीं है। - डा. अशोक मुस्तारिया, इतिहास विभागाध्यक्ष
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें