कुछ दवाओं में शॉल्ट की कमी हो गई।
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चीन से सॉल्ट आना बंद, दवाओं की कमी होनी शुरू
झांसी। दवाओं का 80 प्रतिशत सॉल्ट चीन से ही आता है। कोरोना वायरस के चलते आयात-निर्यात बंद होने के चलते सॉल्ट की कमी हो गई है। ऐसे में कुछ दवाएं मार्केट से शॉर्ट होनी शुरू हो गई हैं। इसमें डायलिसिस में खून पतला करने वाले इंजेक्शन से लेकर स्टेमिना बढ़ाने वाली टैबलेट तक शामिल है। चूंकि, कंपनियों के पास छह से आठ महीने तक के माल का स्टॉक होता है, ऐसे में व्यापक स्तर पर इसका असर नहीं दिखाई दे रहा है।
भारत में कोरोना वायरस को दस्तक दिए लगभग पांच महीने होने को आ रहे हैं। वहीं, मार्च के अंतिम सप्ताह से लॉकडाउन होने के कारण चीन से आयात-निर्यात पर प्रतिबंध है। ऐसे में दवाओं का कच्चा माल चीन से नहीं आ पा रहा है। चूंकि, दवाओं का ज्यादातर सॉल्ट पर देश की निर्भरता चीन पर ही रहती है, ऐसे में माल न आ पाने की वजह से कुछ दवाओं की कमी होने शुरू हो गई हैं। कई मेडिकल स्टोर संचालकों से बातचीत करने पर पता चला कि मौजूदा समय में हिपारिन इंजेक्शन मार्केट से गायब हो गया है। इसका उपयोग डायलिसिस के दौरान खून पतला करने के लिए किया जाता है। हालांकि, मेडिकल कॉलेज में यह पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। इसके अलावा मिथाइल प्रिडनीशिनॉल का साल्ट भी चाइना से आता है। इसका उपयोग शरीर के स्टेमिना बढ़ाने के लिए किया जाता है। सॉल्ट न आ पाने के कारण इस दवा की भी कमी हो गई है। वहीं, टीबी के इलाज के दौरान उपयोग होने वाली फोरकॉक्स दवा की भी बाजार में कम आपूर्ति हो पा रही है। इसके अलावा भी कुछ दवाएं मांग के अनुसार नहीं मिल पा रही है।
भारतीय कंपनियां भी बना रहीं विकल्प
ज्यादातर दवाएं डॉक्टर सॉल्ट के बजाए ब्रांड के नाम से लिखते हैं। ऐसे में भारतीय कंपनियों ने चीन से आने वाले सॉल्ट से निर्मित बड़े ब्रांड नाम वाली दवाएं बनानी शुरू कर दी हैं। ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है कि आगे आने वाले समय में भारतीय दवाएं चीन के सॉल्ट से निर्मित टैबलेटों, इंजेक्शनों का विकल्प बन सकती हैं।