वीरांगना की नगरी झांसी में एक बार फिर सांप्रदायिक सौहार्द की नजीर सामने आई है। यहां ताजियेदार खुदाबख्श ने अस्सी साल पुरानी परंपरा को बदलते हुए अपने ताजिये का स्थान बदल दिया है। इस बार उसने ताजिये को सड़क पर न सजाकर दुकान के भीतर सजाया है,
ताकि दुर्गा मूर्ति विसर्जन शोभायात्रा सुगमता से निकल सकें।
झांसी में सांप्रदायिक सौहार्द की परंपरा पुरानी है। मोहर्रम के जुलूस में रानी का ताजिया सबसे आगे चलता है। यह परंपरा रानी के समय से अनवरत रूप से चली आ रही है। इस बार मोहर्रम पर शहर के खुदाबख्श ने सौहार्द इस परंपरा को आगे बढ़ाया है।
मोहर्रम पर पिछले 80 सालों से गंधीगर टपरा पर ताजिया सजाया जाता है, जो स्व. करीम बख्श के ताजिये के नाम से शहर में मशहूर है। करीम बख्श के निधन के बाद से ताजिया सजाने की जिम्मेदारी का निर्वहन उनके पुत्र खुदाबख्श करते आ रहे हैं। उनका ताजिया बारह फुट ऊंचा और सात फुट चौड़ा होता है, जो उनके पिता के समय से ही सड़क पर सजाया जाता है, लेकिन इस बार मोहर्रम के दरम्यान ही दुर्गा मूर्ति विसर्जन होना है।
शहर की ज्यादातर मूर्तियां गंधीगर टपरे से होते हुए लक्ष्मीताल पर विसर्जन के लिए ले जाई जाती हैं। दुर्गा मूर्ति विसर्जन शोभायात्राओं को निकलने में किसी तरह की समस्या न हो, इसके लिए खुदाबख्श ने खुद आगे बढ़कर अपनी आठ दशक पुरानी परंपरा को बदल दिया है। उन्होंने इस बार अपने ताजिये को सड़क पर न सजाकर पास की ही एक दुकान के भीतर सजाया है। इसके लिए उन्होंने इसका आकार भी छोटा कर दिया है।
खुदाबक्श ने बताया कि यह ताजिया मोहर्रम की छह तारीख से सजाया जाता है। इस बार नवरात्रि व मोहर्रम एक साथ हैं और 11 अक्तूबर को दशहरे पर देवी मूर्तियों की शोभायात्रा यहां से निकलेंगी। देवी की शोभायात्राओं को निकलने में परेशानी न हो, इसके लिए ताजिये का स्थान बदल दिया है। देवी प्रतिमाओं के निकलने के बाद ताजिया फिर पुराने स्थान पर सजा दिया जाएगा।