झांसी। चैत्र मास का कृषि व्यवसाय से जुड़े सभी लोगों को वर्ष भर इंतजार रहता है। खासतौर पर खेतिहर मजदूर फसलों की कटाई कर इस एक माह में पूरे साल के अनाज का इंतजाम कर लेते हैं। लेकिन, इस बार हालात बिलकुल अलग हैं। बुवाई न होने से खेत पाली पड़े हैं, जिससे श्रमिकों को भी काम नहीं मिल पा रहा है। वह मजदूरी के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।
चैत्र के महीने में शहरों में होने वाले निर्माण कार्य की गति धीमी पड़ जाती थी। मजदूरी के रेट उछाल मार देते थे। उस पर भी आसानी से मजदूर नहीं मिल पाते थे। शहर में काम करने वाले मजदूर होली पर अपने गांव लौट जाते थे और चैत्र मास के बाद ही वह वापस लौटते थे। चैत्र में उन्हें गांव में ही कटाई का काम मिल जाता था। श्रमिकों का पूरा परिवार इस काम में जुट जाता था। हाथ में नकदी तो नहीं मिलती थी, परंतु कटाई के बदले साल भर के अनाज का इंतजाम हो जाता था। एक बीघा की कटाई पर एक क्विंटल गेहूं की व्यवस्था हो जाती थी। लेकिन, इस बार 55 फीसदी खेतों में गेहूं की बुवाई ही नहीं हुई, जिससे कटाई का काम भी बेहद कम बचा है। कृषि श्रमिक शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। इसकी बानगी रेलवे स्टेशन पर देखी जा सकती है। स्टेशन पर महानगरों की ओर जाने वाली ट्रेनों के इंतजार में दिन-रात बुंदेलखंड के ग्रामीण मजदूरों का जमघट लगा रहता है।
शहरी आबादी भी है प्रभावित
झांसी। सूखे से शहरी आबादी भी बुरी तरह से प्रभावित है। झांसी महानगर के कई हिस्सों में ही पेयजल संकट शुरू हो गया है। पाइप पेयजल योजना से अब तक अछूते रहे पिछोर, बड़ागांव गेट बाहर, राजपूत कॉलोनी आदि क्षेत्रों में घरों में लगी बोरिंग साथ छोड़ने लगी हैं। इन इलाकों में पानी के टैंकरों की आवाजाही बढ़ रही है। मालूम हो कि क्षेत्र में औसत बारिश 750 मिलीलीटर से तकरीबन चालीस फीसदी कम बारिश हुई है। इससे भूगर्भ जल स्तर काफी नीचे चला गया है।
53 गांवों में टैंकर से पहुंच रहा पानी
झांसी। अत्यधिक सूखा प्रभावित जिले के 53 गांवों में टैंकरों के माध्यम से पेय जलापूर्ति की जा रही है। इन गांवों में 57 टैंकरों से पानी पहुंचाया जा रहा है। इसके अलावा चार सौ हैंडपंप लगाने की योजना है। इस दिशा में जल निगम ने काम भी शुरू कर दिया है। लेकिन, सरकार की यह योजना ज्यादा कारगर होती नजर नहीं आ रही है। पाताल में पानी न होने से यह बोर सफल नहीं हो पा रहे हैं।
मुआवजे का है इंतजार
झांसी। पिछले रबी सीजन में ओलावृष्टि /अतिवृष्टि से खराब हुई फसल का तीन अरब छप्पन करोड़ पचास लाख रुपये मुआवजा बांटा जाना था, जिसमें से अब तक दो अरब अठहत्तर करोड़ पैंतीस लाख रुपये बांटा गया है। बीस हजार से अधिक किसानों को अब तक मुआवजा नहीं मिला है। जबकि, सूखा प्रभावित किसानों को 68 करोड़ मुआवजा दिया जाना है, जिसमें अब तक सिर्फ सात करोड़ रुपये ही मिल पाया है।
...ताकि भूख से न हो मौत
झांसी। सूखे से असहाय हुए बुंदेलखंड के गरीब ग्रामीण परिवारों को राहत किट बांटी जा रही हैं। प्रत्येक किट में 10 किलो आटा, 25 किलो आलू, पांच किलो चने की दाल, पांच लीटर सरसों का तेल, एक किलो देशी घी व एक किलोग्राम मिल्क पाउडर है। यह हर माह उपलब्ध कराई जाएगी। यह कवायद ग्रामीणों को भूख से बचाने के लिए की जा रही है।
मनरेगा का सहारा
झांसी। सूखे में झुलस रहे बुंदेलखंड के गरीबों को मनरेगा का सहारा मिल रहा है। यहां की विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए मनरेगा के कार्य दिवस सौ से बढ़ाकर साल में डेढ़ सौ कर दिए गए हैं। मनरेगा में अधिक से अधिक ग्रामीणों को रोजगार देने पर जोर दिया जा रहा है।
पशुओं के लिए खोले गए राहत केंद्र
झांसी। सूखे से पशुओं के लिए चारे-पानी का संकट गहराया हुआ है। इससे निपटने के लिए जिले के आठों ब्लॉकों में एक-एक पशु राहत केंद्र खोला गया है, जिनमें पशुओं को मुफ्त चारे की व्यवस्था की गई है। मालूम हो कि राहत केंद्र प्रत्येक ब्लॉक में दो खोले जाने हैं, परंतु अब तक एक-एक ही शुरू हो पाया है।