झांसी। परीक्षा के दबाव में झांसी में दो छात्राओं ने आत्महत्या कर ली। इसके अलावा मनोचिकित्सकों और मनोवैज्ञानिकों के पास इन दिनों एक दिन में आठ-दस केस आ रहे हैं। परीक्षार्थी बता रहे हैं कि वह परीक्षा को लेकर भयभीत हैं। उन्हें लग रहा कि उनके नंबर बहुत कम आएंगे। इस डर की वजह से अब वह परीक्षा के अंतिम दिनों में पढ़ाई पर फोकस नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में शहर के मंडलायुक्त, डीआईजी और कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति छात्र-छात्राओं के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं हैं। इनका कहना है कि उन लोगों ने भी पढ़ाई के दौरान कई उतार का सामना किया। मंडलायुक्त ने कहा कि वह तो गणित विषय में बहुत कमजोर थे, उन्हें भी तनाव होता था लेकिन उन्होंने कभी खुद पर तनाव को हावी नहीं होने दिया। डीआईजी ने कहा उन्हें तो आईपीएस में तीसरे प्रयास में सफलता मिली थी। वहीं, कृषि विवि. के कुलपति बता रहे हैं कि अगर वह भी टॉपर बनने की चाह में तनाव रखते तो आज कुलपति नहीं होते। इसलिए जरूरी है कि छात्र नंबरों को महत्व देने देने की बजाय अपने लिए सफलता का बिंदु तय करें और तनाव रहित होकर परीक्षा दें।
कभी 11वीं में गणित में फेल हुए थे, आज झांसी में हैं मंडलायुक्त
मंडलायुक्त डॉ. आदर्श सिंह उन छात्र-छात्राओं के लिए बड़ा उदाहरण हैं, जो परीक्षा में असफल होने के डर से तनाव में हैं। आयुक्त उन विद्यार्थियों के लिए भी मिसाल हैं, जो 10वीं, 12वीं या स्नातक की परीक्षा को ही जीवन की अंतिम सीढ़ी मानते हैं। डॉ. आदर्श सिंह ने बताया कि वह शुरू से ही मेधावी छात्र रहे, मगर गणित में कमजोर रही। हाईस्कूल की परीक्षा उन्होंने 90 फीसदी अंकों से पास की। मगर 11वीं में वो गणित विषय में फेल हो गए थे। वह निराश हुए मगर हारे नहीं। उन्होंने ठान लिया था कि अब गणित में और ज्यादा मेहनत करेंगे। एक साल में ही उनकी मेहनत रंग लाई। 12वीं की परीक्षा उन्होंने 90 फीसदी अंकों से पास की। मगर उनके लिए सबसे खास रहा गणित में सौ में 70 अंक लाना। मंडलायुक्त ने बताया कि इंटरमीडिएट के बाद मेडिकल की पढ़ाई के लिए उन्होंने प्रतियोगी परीक्षा दी थी। मगर पहली बार में उनका चयन नहीं हुआ। दूसरी बार में वर्ष 2000 में उनका चयन हुआ और उन्होंने एमबीबीएस में प्रवेश ले लिया। फिर उन्होंने इंटर्नशिप करते हुए सिविल सर्विसेज की तैयार की। उन्होंने खूब मेहनत की। पहली ही बार में उनका चयन आईएएस के लिए हो गया। उन्होंने कहा कि जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। मगर इससे घबराना नहीं चाहिए। अगर असफल हों तो निराश होने के बजाय मेहनत और ज्यादा करने लगें। फिर सफलता आपके कदम चूमेगी।
10वीं में 62 फीसदी नंबर मिले थे पर तनाव से नहीं हारा : डीआईजी
झांसी। डीआईजी जोगेंद्र कुमार शुरूआत में औसत विद्यार्थी रहे हैं। हाईस्कूल से लेकर इंटरमीडिएट में उनके 62 से 64 फीसदी के बीच में अंक आए। स्नातक से उन्होंने पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देना शुरू किया और 75 फीसदी अंक आए। फिर उन्होंने सिविल सर्विसेज की तैयारी करने के बारे में सोचा। दो बार प्रतियोगी परीक्षा देने पर उनका चयन नहीं हुआ। मगर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और तनाव से हार नहीं मानी। ज्यादा मेहनत की। तीसरी बार में उनका चयन आईपीएस के लिए हो गया। डीआईजी का कहना है कि लक्ष्य को हासिल करने की ललक होनी चाहिए फिर सफलता जरूर मिलेगी। तनाव पालने से वक्त और स्वास्थ्य दोनों हाथ से जाते हैं। कभी भी नए सिरे से शुरूआत की जा सकती है। किसी को कम नंबर आए तो जिंदगी खत्म नहीं होती है। अब तो स्टार्ट अप का जमाना है। छात्र अपना बिजनेस शुरू करें और दूसरों को रोजगार बांटे।
कभी क्लास में टॉप नहीं कर पाए, अब हैं कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति
झांसी। रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एके सिंह ने क्लास में कभी टॉप नहीं किया। मगर आज वो क्लास में टॉप करने वालों से कहीं आगे हैं। उन्होंने 10वीं की परीक्षा 65 फीसदी और 12वीं की 64 प्रतिशत अंकों से पास की थी। उन्होंने कहा कि जरूरी नहीं है कि जो लोग क्लास में टॉप करते हैं, वो ही जीवन में आगे चलकर सफल होते हैं। उन्होंने खुद इसका अनुभव किया है। 10वीं, 12वीं या अन्य कक्षाओं के अंक बहुत ज्यादा मायने नहीं रखते, बल्कि पढ़ा हुआ समझना बहुत जरूरी है। बहुत अच्छे अंक लाने वाले छात्र भी प्रतियोगी परीक्षा पास नहीं कर पाते। जबकि, समाज में कई ऐसे उदाहरण भी हैं, जो औसत छात्र होते हुए भी प्रतियोगी परीक्षाएं पास कर गए। इसलिए कभी भी परीक्षा के दौरान उम्मीद के अनुसार अंक न आने पर हताश नहीं होना चाहिए।