झांसी। प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सुगबुगाहट शुरू हो गई है। सभी प्रमुख राजनीतिक दलों में टिकट पाने को लेकर दावेदारों की हलचल दिखाई देने लगी है। पर, भाजपा में अंदर खाने जो चल रहा है वह शुभ संकेत नहीं कहे जा सकते हैं। गर्दिश के दिनों में पार्टी का झंडा थामकर चलने वाले कार्यकर्ताओं की अनदेखी व दूसरे दलों से भाजपा में शामिल हुए नेताओं पर मेहरबानियां निष्ठावानों को रास नहीं आ रहीं हैं।
यूपी सीधे देश की राजनीति को प्रभावित करता है। चूंकि, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री व रक्षामंत्री यूपी से लोकसभा व राज्यसभा सदस्य हैं, ऐसे में भाजपा के लिए विधानसभा के चुनाव एक चुनौती के रूप में हैं। इस बार पार्टी ने केंद्र सरकार के कार्यों के बलबूते पर बुंदेलखंड की 19 सीटों में 14 पर जीत हासिल करने का लक्ष्य तय किया है। इस लक्ष्य को पाने के लिए पार्टी दूसरे दलों को छोड़कर आ रहे नेताओं को अधिक तरजीह दे रही है।
हालांकि, इस मामले में पार्टी के अनुभव कटु हैं। भाजपा ने अब तक जिन दलबदलू नेताओं को चुनाव लड़ाया, उन्होंने पार्टी को पराजय का ही स्वाद चखाया है। चरखारी के उपचुनाव को ही ले लिया जाए तो यहां से उमा भारती के संसद सदस्य बनने के बाद दूसरे दल से आए एक नेता के पुत्र को लड़ाया गया, इसमें पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। जिला पंचायत चुनाव में सदस्य पद के लिए तत्कालीन जिलाध्यक्ष तक को टिकट नहीं दिया गया, दूसरी पार्टी से आए जिस प्रत्याशी को लड़ाया उसे भी मुंह की खानी पड़ी।
बुंदेलखंड की अधिकांश विधानसभा क्षेत्रों में कमोवेश यही स्थिति बनती जा रही है। हालांकि, इस मुद्दे पर पार्टी के सभी वरिष्ठ नेता कुछ भी कहने से बच रहे हैं। मालूम हो कि, बुंदेलखंड की 19 सीटों में अभी भाजपा के पास एक ही विधायक है।
क्षेत्रीय टीम से हटाए गए पुरानेनेता
भाजपा की क्षेत्रीय टीम से हाल में ही दो वरिष्ठ नेताओं को हटा दिया गया, जबकि उनकी जगह जिनको पदाधिकारी बनाया गया, उनको कुछ समय पहले ही पार्टी में प्रवेश मिला है। इस निर्णय से कार्यकर्ताओं में मायूसी नहीं है।