झांसी। बुंदेलखंड की एक बेटी जिसकी हथेली की मेंहदी का रंग भी फीका नहीं पड़ा था और उसने मातृभूमि की रक्षा के लिए हंसते- हंसते अपना प्यार कुर्बान कर दिया ,कहानी है झांसी जिले के लोहागढ़ कसबे की जहां 1887 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में जब अंग्रेजों ने झांसी पर धावा बोल दिया तो महारानी लक्ष्मीबाई कालपी की ओर जा रही थी, इसी दौरान अंग्रेज सैनिकों की एक टुकड़ी ने उनका रास्ता रोक लिया। दोनों ओर से घमासान युद्ध चल रहा था और उधर एक प्रेमी युगल शादी करके अपने गांव लोहागढ़ लौटा था, डोली से उतरी दुल्हन ने सुहागरात में जाने से मना करते हुए दूल्हे से कहा आप मातृभूमि की रक्षा के लिए पहले रणभूमि में जाइए यही मेरे प्यार का सबसे बड़ा तोहफा होगा। हमने साथ जीने और साथ मरने की कसम ली है, इस दुनिया में न सही युद्ध में तो साथ -साथ जी और मर सकते हैं। दूल्हा तलवार लेकर युद्ध भूमि में कूद पड़ा। अंग्रेजी सेना से लड़ते हुए पति शहीद हो गया तो मौके पर पहुंची दुल्हन ने भी रणभूमि में लड़ते हुए अपने प्राण त्याग दिए।
इस संबंध में इतिहासकार डा. चित्रगुप्त बताते हैं कि झांसी जिले की मोंठ तहसील में स्थित लोहागढ़ कसबे के बीचोबीच दूल्हा जू की समाधि है, आज भी न केवल लोहागढ़ बल्कि आसपास के कई गांवों के लोग उन्हें माथा टेकने आते हैं। एक से तीन मई तक हर साल यहां पर एक विशाल मेला भी लगता है। चित्रगुप्त के अनुसार यह वाकया है 1857 का। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम शुरू हो चुका था। अंग्रेजों ने झांसी पर धावा बोल दिया था। महारानी लक्ष्मीबाई कालपी की ओर निकली थी कि रास्ते में लोहागढ़ के पास ही अंग्रेजों की एक टुकड़ी ने उनका रास्ता रोक लिया। गांव के लोगों को जैसे ही मालूम चला तो बाईसा के पक्ष में पूरा गांव अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध में उतर गया। उधर, लंबे अरसे से एक दूसरे से प्यार करने वाले रज्जब खां जिन्हें गांव के लोग ़डरु सिंह के नाम से भी बुलाते थे, इनका पास के ही गांव की युवती से ब्याह हुआ था।
बारात लौटकर आई। दुल्हन डोली से और दूल्हा घोड़े से उतरा तो देखा कि गांव में कोई भी नहीं है, चारों ओर से गांव में गोलियों की तड़तड़ाहट और तलवारों की खनक गूंज रही थी। नववधु और दूल्हे को माजरा समझते देर नहीं लगी। दुल्हन ने रज्जब खां से कहा प्यार से ऊपर है मातृभूमि, हम सुहागरात में नहीं युद्धभूमि में जाएंगे। मेरे मुंह दिखाई का सबसे बड़ा तोहफा यही होगा। रज्जब खां दूल्हे के वेष में ही अपने घोड़े पर सवार होकर युद्धभूमि में चला गया। भीषण युद्ध में अंग्रेजों के कई सैनिक मारे गए, महारानी लक्ष्मीबाई को यहां से कालपी के लिए सुरक्षित निकाल दिया गया और रज्जब खां जिन्हें डरूसिंह भी कहते थे इनके नेतृत्व में गांव के लोग अंग्रेज सैनिकों की टुकड़ी को अपने युद्ध कौशल से कई घंटे रोके रहे। लोहागढ़ के निवासी उदय लुहारी बताते हैं कि रज्जब खां ने तीन अंग्रेज सैनिकों के सिर काटकर गढ़ी के अंदर गाड़ दिए थे। बाद में किसी सैनिक ने पीछे से बार करके रज्जब का सिर धड़ से अलग कर दिया। कहा जाता है कि पुरुषों की मृत्यु की खबर सुनकर दुल्हन मेहताब गांव की महिलाओं को लेकर रणभूमि में पहुंची तथा कई घंटे तक लड़ाई लड़ने के बाद वह भी रणभूमि में ही शहीद हो गईं। युद्ध के मैदान में दूल्हे के लिबास में पड़े रज्जब और दुल्हन के जोड़े में पड़ी मेहताब ने यह बता दिया कि प्यार से ऊपर होती है मातृभूमि। इतिहासकार डा. चित्रगुप्त बताते हैं कि इस पूरे प्रसंग पर जानकी शरण वर्मा ने एक कि ताब भी लिखी है, इसमें दूल्हा जू का असली नाम रज्जब खां लिखा गया है, जबकि गांव के कुछ लोग उनका नाम डरु सिंह बताते हैं। लोहागढ़ निवासी उदय लुहारी का कहना है कि रज्जब खां की कहानी का जानकी शरण वर्मा ने अपनी किताब में उल्लेख किया है तथा आज भी इन्हें दूल्हा जू के रूप में हिंदू व मुस्लिम सभी समुदाय के लोग पूजते हैं। हिंदू इन्हें डरू सिंह के नाम से जानते हैं और मुस्लिम रज्जब खां के नाम से।