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बुंदेलखंड के साहित्य का होना चाहिए पुनर्वलोकन

Wed, 30 Mar 2016 01:19 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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bu, jhansi hindi news - फोटो : amar ujala
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झांसी। बुंदेलखंड श्रृंगार और रीति कालीन साहित्य के लिए जाना जाता है। आधुनिक काल में भी बुंदेलखंड के कई कवि हुए हैं। इतिहासकारों ने बुंदेलखंड को युद्ध देश कहा है। इस युद्ध देश के साहित्य का पुनर्वलोकन होना चाहिए। बुंदेलखंड के दरबार, कवियों पर तो बहुत शोध हुए लेकिन उन्होंने क्षेत्र के लिए क्या किया उस पर शोध की गुंजाइश है। यह विचार बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुख्य अतिथि साहित्य अकादमी के अध्यक्ष प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने व्यक्त किए।
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‘बुंदेलखंड में साहित्य की परंपरा- खड़ी बोली एवं बुंदेली के विशेष संदर्भ में’ विषयक संगोष्ठी में उन्होंने कहा कि बुंदेलखंड की एक समृद्ध एवं विशिष्ट साहित्यिक परंपरा रही है। आज वर्तमान व आने वाली युवा पीढ़ी के साहित्यकारों को इस परंपरा को संजोकर रखना होगा।

कुलपति प्रो. सुरेंद्र दुबे ने कहा कि वर्तमान में कतिपय कारणों से युवाओं का रुझान साहित्य की ओर भले ही कुछ कम हो रहा हो लेकिन आज भी साहित्य के प्रति रुचि रखने वाले विद्यार्थियों की कमी नहीं है। उद्घाटन सत्र में मुख्य वक्ता हिंदी के विद्वान डॉ. राम शंकर द्विवेदी ने कहा कि बुंदेलखंड आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त, वृंदावन लाल वर्मा की कर्मभूमि एवं तपोभूमि रही है। स्वाधीनता संग्राम की चेतना जाग्रत करने में बुंदेलखंड के साहित्यकारों एवं कवियों का अहम योगदान रहा है। इस दौरान संगोष्ठी की स्मारिका का भी विमोचन किया गया।
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संगोष्ठी में समन्वयक प्रो. एमएल मौर्य, आयोजन सचिव डॉ. सत्यवान शुक्ला, कुलसचिव वीएन सिंह, वृंदावनलाल वर्मा के पौत्र रमाकांत तथा लक्ष्मीकांत सहित प्रो. रोचना श्रीवास्तव, प्रो. सुनील काबिया, प्रो. अपर्णा राज, इं. राहुल शुक्ला, डॉ. सीपी पैन्युली, डॉ. धीरेंद्र यादव, डॉ. श्वेता पांडेय, डॉ. मो. नईम, डॉ. संतोष पांडेय, डॉ. अंकित श्रीवास्तव, डॉ. वीवी निरंजन आदि मौजूद रहे। संचालन डॉ. जयशंकर तिवारी ने किया।

उद्घाटन सत्र के बाद प्रथम तकनीकी सत्र काव्य की परंपरा विषय पर आधारित रहा। इस सत्र की अध्यक्षता डॉ. सदानंद गुप्ता ने की। डॉ. पवन अग्रवाल ने मुख्य वक्तव्य दिया, जबकि डॉ. दिनेश कुशवाहा तथा रविंद्र शुक्ल ने काव्य की परंपरा पर व्याख्यान दिए। द्वितीय तकनीकी सत्र में भी दो व्याख्यान दिए गए। प्रो. विजय बहादुर सिंह ने अपने व्याख्यान में हिंदी साहित्य की कथा परंपरा के विभिन्न आयामों को रखा। कथा साहित्य की परंपरा विषय पर आधारित इस सत्र की अध्यक्षता डॉ. मैत्रेयी पुष्पा ने की। इसके बाद सभी प्रतिभागी राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की कर्मस्थली चिरगांव गए।  

व्यंग्य भी कसा
मुख्य अतिथि साहित्य अकादमी के अध्यक्ष ने अपने संबोधन में पुरस्कार लौटाने वालों पर व्यंग्य भी कसा। उन्होंने कहा कि आज के समय में पुरस्कार हासिल करने से ज्यादा लौटाना महत्वपूर्ण हो गया है। यह सुनते ही ऑडिटोरियम हॉल में उपस्थित सभी लोगों की हंसी छूट गई।
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