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ब्रिटिश हुकूमत संग हुआ समझौता आज भी बना है फांस

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झांसी। पहूंज बांध निर्माण के समय ब्रिटिश हुकूमत संग हुआ समझौता डेढ़ दर्जन गांव के लोगों के लिए आज भी गले की फांस बना है। करीब सवा सौ साल पहले ब्रिटिश सरकार ने समझौते पर किसानों से जमीन ली लेकिन, मुआवजा नहीं दिया। आज तक सिंचाई महकमा उसी समझौते का हवाला देते हुए मुआवजा देने से बचता रहा हालांकि अब अफसरों ने इस संबंध में शासन स्तर पर लिखा-पढ़ी आरंभ की है।
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ब्रिटिश दौर में झांसी की पानी की जरूरत पूरा करने के लिए वर्ष 1907-1909 में पहूंज बांध बना। ठोस पत्थर से 16 एमसीएम (मिलियन क्यूबिक लीटर) क्षमता का बना पहूंज बांध अपने समय का बेमिसाल बांध है लेकिन, जहां यह बांध बना उसके लिए ब्रिटिश हुकूमत ने किसानों को मुआवजा देने के बजाए अपनी ताकत का इस्तेमाल करते हुए करीब 500 हेक्टेयर जमीन हथिया ली। ब्रिटिश अफसरों ने जमींदारों संग समझौता करते हुए तय किया कि सरकार डूब क्षेत्र की भूमि का अधिग्रहण नहीं करेगी। किसान किसी क्षति के मुआवजे का दावा नहीं करेंगे। किसान जो जमीन जलाशय के खाली होने के उपरांत निकल आएगी, उस पर एक रूपए प्रति एकड़ की दर से लगान का भुगतान करके खेती कर सकेंगे। पहूंज बांध की निर्मित वीयर लगभग 100 वर्ष पुरानी होकर अपनी आयु पूरी कर चुकी। ऐसे में यह जमीन अकसर डूब में रहती है। किसान इसमें खेती नहीं कर पाते लेकिन, सिंचाई विभाग ब्रिटिश काल में हुए समझौते का हवाला देते हुए इस जमीन के लिए मुआवजा देने का भी राजी नहीं होता। इस वजह से सिमरधा, करारी, परबई, पलींदा, पाली, पहाड़ी, लहरगिर्द, नयागांव, ढहरी के आसपास के लोग करीब 300 हेक्टेयर भूमि पर न नियमित खेती कर पा रहे, न उनको मुआवजा ही मिल रहा। पिछले वर्ष सिंचाई विभाग ने बांध की ऊंचाई बढ़ाने का फैसला किया। ऐसे में इन गांवों को स्थाई डूब क्षेत्र में आना तय हो गया। सिमरधा का 75.393 हे., करारी का 42.640 हे. परबई का 85.237 हे. आदि क्षेत्रफल को निश्चित डूब क्षेत्र में आना था। इससे करीब 200 परिवार प्रभावित हो रहे हैं लेकिन, मुआवजा का मामला तय न होने से यह प्रस्ताव अटका हुआ है। सिंचाई विभाग के अधिकारियों के मुताबिक इसके लिए शासन को पत्र भेज दिया गया है। मामला अभी न्याय विभाग में लंबित है। वहां से निर्णय होने पर ही आगे कार्रवाई हो सकेगी।
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