झांसी। लक्ष्मी तालाब के तट पर स्थित भगवान भूतनाथ मंदिर चार सौ वर्ष पुराना है। महाशिवरात्रि पर यहां भगवान शिव और पार्वती के विवाह की रस्म पूरी करने के लिए वाराणसी से विद्वान आते हैं। मान्यता है कि इस मंदिर के लगातार 11 सोमवार को दर्शन करने से मनोरथ पूरे होते हैं। कभी भगवान भूतनाथ का भस्म से श्रृंगार किया जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है।
लक्ष्मी तालाब के तट पर भगवान भूतनाथ (शिवजी) मंदिर में नंदी जोड़ी में विराजमान हैं और गणेश जी की दो मूर्तियां हैं। लेकिन, दोनों मूर्तियों की सूंड अलग - अलग दिशा में हैं। महाशिवरात्रि पर करीब दो सौ साल से भगवान शिव की बरात निकाली जा रही है। लक्ष्मी तालाब के पास श्मशान घाट है। मंदिर के पास एक बरगद का पेड़ है। इस पेड़ के नीचे लोग अंत्येष्टि के बाद संस्कार करते हैं। पुजारी की मानें तो वर्षों पहले मृतक के अंतिम संस्कार के बाद भस्म से भगवान भूतनाथ का अभिषेक किया जाता था, लेकिन अब यह बंद है। महाशिवरात्रि पर यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ होती है। इसके अलावा नागपंचमी पर भी श्रद्धालुओं का तांता लगता है।
मंदिर की खासियत यह है कि महाशिवरात्रि पर दोपहर में पूजा अर्चना के बाद भगवान की बरात निकाली जाती है, इसमें देवताओं के स्वरूप शामिल होते हैं। रात में भगवान शिव और मां पार्वती के विवाह की रस्म अदा की जाती है। वैवाहिक रस्में वाराणसी के विद्वान अदा कराते हैं। रात्रि के चार पहर पूजा और आरती होती है।
गंदगी के कारण बुरा हाल
लक्ष्मी तालाब के किनारे गंदगी होने के कारण यहां श्रद्धालुओं को असुविधा का सामना करना पड़ता है। यहां पर सुअर घूमते हैं, जिससे पूजा- अर्चना करने आने वालों को परेशानी का सामना करना पड़ता है।