झांसी। होली पर्व आते ही बुंदेलखंड के गांव-गांव में फागें गूंजने लगी हैं। यह फागें यहां की होली की शान हैं। लोक कवियों ने फागों में होली के विविध रंगों को भरा है। श्रीकृष्ण भक्ति से सराबोर फागें छेड़छाड़ व प्रेम को अभिव्यक्त करती हैं।
बुंदेलखंड में फाग गायन वसंत पंचमी से शुरू हो जाता है। यह सिलसिला नव संवत्सर तक चलता है। रंग पंचमी पर तो खासी धूम होती है। मंदिरों व ग्रामीण अंचल की चौपालों में फागों का अलग ही रंग बिखरता है। शहरों में भी विभिन्न स्थानों पर मंडली घूमती हैं। दरअसल, बुंदेली लोक कवियों ने फाग गीतों पर कुछ ज्यादा ही कलम चलाई है। लोक कवि ईसुरी की फागों के रंग हर चौपाल व मंदिरों में बिखरते हैं। ब्रज एवं अवध क्षेत्र के मंदिरों में भी इन फागों की धूम रहती है।
बुंदेली संस्कृति के जानकार हरगोविंद कुशवाहा के मुताबिक ईसुरी की फाग ‘भींजी फिरे राधिका रंग में, मन मोहन के संग में, रंग की धूमल धाम मचा दई ब्रज की सब गलियन में, कोऊ माजूम धतूरा फांके, कोई छक दई भंग में, तन कपड़ा गए ऊंघर ईसुरी करी ढाक सब रंग में।’ ईसुरी द्वारा रचित यह फाग जहां राधिका एवं श्रीकृष्ण के प्रेम को दर्शाती है, वहीं होली के हुल्लड़ को भी अभिव्यक्त करती है। इसी प्रकार संत कवि चंद्रसखी क ा फाग गीत ‘होरी खेलन आयो श्याम आज जाए रंग में बोरो री’ को भी ब्रज एवं बुंदेलखंड के मंदिरों में संगीतज्ञों एवं फाग कलाकारों द्वारा गया जाता है।
संगीताचार्य हरीराम वर्मा के अनुसार कवि प्रकाश का फाग गीत ‘मौं पर जो रंग जिते निहारों, उते बोई रंग डारो’ भी खूब पसंद किया जाता है। कई बुंदेली कवियों के फाग गीत हिंदी फिल्मों में भी गाए गए हैं। बुंदेलखंड के भक्ति कालीन युग के बुंदेली कवि पद्माकर व्यास, हरीराम व्यास, मदनेश एवं वर्तमान में महाकवि अवधेश ने कई बेमिसाल फाग गीत लिखे हैं, जो आज बुंदेलखंड की फाग गायकी की शान हैं।
होलिका दहन का शुभ मुहूर्त 23 को
होलिका दहन का शुभ मुहूर्त फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा 23 मार्च को सायं 7 बजे से रात्रि 9 बजे तक है। ज्योतिषाचार्य पं. मनोज थापक के अनुसार इन दो घंटों में प्रदोष काल रहेगा जो शुभ योग है। मेष, कन्या, मकर, मिथुन राशि के जातकों को छोड़ शेष अन्य राशियों के जातकों के लिए होली लाभप्रद है। उनके अनुसार 22 मार्च को भद्रा होने से होलिका का दहन नहीं किया जा सकता है।