झांसी। वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई की गौरव गाथा को जन-जन तक पहुंचाने वाले पद्मभूषण डा. वृंदावन लाल वर्मा की नौ जनवरी (शनिवार) को 132वीं जयंती है। कालजयी साहित्यकार डा. वर्मा के साहित्य में बुंदेलखंड रचाबसा है। यही वजह है कि उन्हें बुंदेलखंड का वॉल्टर स्कॉट भी कहा जाता है। जिस प्रकार से वॉल्टर स्कॉट ने अपनी रचनाओं में छोटे से देश स्कॉटलैंड का सजीव चित्रण किया था, ठीक उसी प्रकार डा. वर्मा के साहित्य में बुंदेलखंड नजर आता है। उनकी कृतियां आज भी देश - विदेश के पुस्तकालयों में हिंदी प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहती हैं।
डा. वृंदावन लाल वर्मा का जन्म 09 जनवरी 1889 को मऊरानीपुर कस्बे के कुलीन कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके पिता दीवान आनंद राय थे। मऊरानीपुर में उनके साथ उनकी दादी और परदादी रहती थीं। परदादी द्वारा ही वर्मा जी को रानी लक्ष्मीबाई की आंखों देखी कहानी सुनने को मिली। इससे प्रेरित होकर उन्होंने 1946 में पुस्तक ‘झांसी की रानी लक्ष्मीबाई’ लिखी। उनके इस उपन्यास के जरिये रानी लक्ष्मीबाई की गौरव गाथा सहज शब्दों के साथ जन-जन तक पहुंची। इतना ही नहीं, उनके साहित्य में बुंदेलखंड की कला, संस्कृति, रीति रिवाज, नदी, जंगल व सामान्य जन जीवन का सजीव चित्रण मिलता है। उनके गढ़कुंडार, लगन, संगम, प्रत्यागत, कुंडली चक्र, प्रेम की भेंट, विराटा की पद्मिनी, कचनार, मृगनयनी, टूटे कांटे समेत अन्य कई उपन्यास, नाटक व कहानी संग्रह कालजयी हैं, जो अब भी हिंदी प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।
डा. वर्मा की प्रमुख कृतियां
जीवनी:- महात्मा बुद्ध का जीवन चरित्र
गद्यगीत:- हृदय की हिलोरें
उपन्यास:- गढ़कुंडार, लगन, संगम, प्रत्यागत, कुंडली चक्र, प्रेम की भेंट, विराटा की पद्मिनी, मुसाहिबजू, कभी न कभी, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, कचनार, दबे पांव, आंचल मेरा कोई, माधव जी सिंधिया, सोती आग, टूटे कांटे, मृगनयनी, सोना, अहिल्याबाई, भुवन विक्रम, आहत, उदयीकरण, रामगढ़ की रानी, महारानी दुर्गावती, कीचड़ और कमल, ललितादित्य, डूबता शंखनाद, भारत यह है, देवगढ़ की मुस्कान व अमर ज्योति
नाटक:- मंगलसूत्र, राखी की लाज, सगुन, झांसी की रानी, लो भाई पंचों लो, बांस की फांस, काश्मीर का कांटा, फूलों की बोली, हंस मयूर, जहांदारशाह, खिलौने की खोज, बीरबल, पूर्व की ओर, नीलकंठ, पीले हाथ, कनेर, केवट, ललित विक्रम, निस्तार, देखा देखी, रश्मि समूह व युद्ध के मोर्चे से
कहानी संग्रह:- कलाकार का दंड, शरणागत, तोषी, अंगूठी का दान, मेंढकी का ब्याह व ऐतिहासिक कहानियां
ये कहा था महापुरुषों ने
श्री वृंदावन लाल वर्मा एक सफल और ख्यातिप्राप्त उपन्यासकार हैं। उनके पात्र बहुत सजीव हैं। उनके आचार, विचार और अंतवृत्तियों में आज हमारे ग्रामीण समाज के बदलते हुए रूप का आभास मिलता है।
- लाल बहादुर शास्त्री, पूर्व प्रधानमंत्री
डा. वृंदावन लाल वर्मा ने ऐतिहासिक उपन्यासों और छोटी कहानियों द्वारा हिंदी साहित्य का संवर्धन किया है। उनकी लंबी साहित्य सेवा के कारण देश ने उन्हें आदर और सम्मान दिया।
- इंदिरा गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री
सरकार ने जारी किया था डाक टिकट
झांसी। डा. वृंदावन लाल वर्मा की जीवन यात्रा 23 फरवरी 1969 को समाप्त हो गई थी। उनके निधन के बाद 09 जनवरी 1997 को भारत सरकार ने उन पर डाक टिकट जारी किया था। जबकि, इससे पहले सरकार ने उन्हें पद्मभूषण की उपाधि से नवाजा था। इसके अलावा उन्हें उत्तर प्रदेश साहित्य पुरस्कार, मध्य प्रदेश साहित्य पुरस्कार, संसद पुरस्कार, काशी नागरी सभा पुरस्कार समेत देश - विदेश के तमाम पुरस्कार मिले।
बुंदेली संस्कृति को सहेजा
डा. वृंदावन लाल वर्मा ने अपने साहित्य में बुंदेलखंड की संस्कृति को खूब सहेजा। उन्होंने अपने लेखन में बुंदेली लोकगीतों का पर्याप्त वर्णन किया। बुंदेली लोक गीतों के साथ बुंदेली भक्ति गीतों का भी यथार्थ चित्रण किया। उनके साहित्य में नागपंचमी, हरछठ, जवारों का मेला, होली, दीवाली आदि जैसे त्योहारों को बुंदेली अंदाज में दर्शाया। उनके उपन्यास बुंदेलखंड के संपूर्ण सांस्कृतिक जीवन का चित्रण करते हैं। उन्होंने बुंदेलखंड की प्रत्येक परंपरा को अत्यधिक सूक्ष्म ढंग से चित्रित किया।
- हरगोविंद कुशवाहा, उपाध्यक्ष - अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान
वट वृक्ष हैं हिंदी साहित्य के
डा. वृंदावन लाल वर्मा हिंदी साहित्य के वट वृक्ष हैं। उन्होंने बुंदेलखंड की संस्कृति को पूरे देश में पहचान दिलाने में बड़ा योगदान दिया। इसके अलावा प्रकाशकों पर निर्भर रहने वाले लेखकों को उन्होंने स्वयं का प्रकाशन प्रारंभ कर एक नया मार्ग दिखाया। उन्होंने अपने साहित्य में हमेशा नारी गरिमा का ख्याल रखा। इतना ही नहीं, वह पेशे से अधिवक्ता थे और राजनीति में भी सक्रिय रहे। जिला परिषद के अध्यक्ष रहे और जिला सहकारी बैंक के संस्थापक व प्रबंध निदेशक रहे।
- पीके अग्रवाल, सेवानिवृत्त आईएएस