झांसी। कोरोना वायरस के संक्रमण के नियंत्रण के लिए पिछले साल 25 मार्च को लागू किए गए लॉकडाउन के बाद शहर एकदम सन्नाटे के आगोश में समा गया था। झांसी ने मायूसी का ये मंजर अपने इतिहास में दूसरी बार देखा था। पहली बार रानी के वीरगति को प्राप्त होने के बाद पूरे झांसी शहर में एक पखवाड़े तक सन्नाटा पसरा रहा था। एक तरफ लोगों में रानी की शहादत का शोक था, दूसरी ओर फिरंगी सेना का खौफ।
अब से ठीक एक साल पहले 25 मार्च को केंद्र सरकार ने लॉकडाउन लागू किया था। आवश्यक सेवाओं को छोड़कर बाकी सभी गतिविधियों पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई थी। सभी को घर में रहने की हिदायत दी गई थी। बाहर निकलने वालों को पुलिस की सख्ती का सामना करना पड़ रहा था। लॉकडाउन के दरम्यान शहर में लगातार वीराना छाया रहता था। लोग सहमे हुए अपने घरों में बैठे रहते थे। हालांकि, झांसी में ये पहली बार नहीं हुआ था, बल्कि 162 साल पहले भी शहर ने इस वीराने के मंजर को देखा था।
अपनी झांसी को बचाने के लिए फिरंगी सेनाओं से मुकाबला करते हुए वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई ने ग्वालियर में 18 जून 1858 को वीरगति प्राप्त की थी। ये सूचना झांसी आने पर पूरे शहर में शोक की लहर दौड़ गई थी। हर कोई गमगीन था। यहां तक कि लोगों ने शादी - ब्याह व अन्य व्यक्तिगत आयोजनों से भी दूरी बना ली थी। झांसी मातमी सन्नाटे के आगोश में समा गया था। ये स्थिति एक पखवाड़े तक बनी रही थी। शहर की चहल - पहल लौटने में लंबा वक्त लग गया था। लॉकडाउन के दरम्यान झांसी ने डेढ़ शताब्दी पुराना इतिहास दोहराया था।
रानी को वीरगति प्राप्त होने के बाद झांसी में शोक की लहर दौड़ गई थी। हर कोई अपने को अनाथ सा महसूस कर रहा था। हफ्तों झांसी सन्नाटे के आगोश में समायी रही थी। स्थिति सामान्य होने में लंबा वक्त लग गया था।
- हरगोविंद कुशवाहा, इतिहासकार /उपाध्यक्ष - अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान
1858 में लोगों में रानी के जाने का शोक और फिरंगी सेनाओं का खौफ था। झांसी को फिरंगी सेनाएं रौंद रहीं थीं। खौफजदा लोग घरों से बाहर निकलने से कतरा रहे थे। झांसी में लंबे समय तक सन्नाटा पसरा रहा था।
- मुकुंद मेहरोत्रा, इतिहासकार