झांसी। पूरा देश मैथिली शरण गुप्त को राष्ट्रकवि के रूप से जानता है पर बुंदेलखंड के लोग अपनी धरती के इस लाल कोे दद्दा कहकर संबोधित करते हैं। झांसी से तीस किलोमीटर दूर चिरगांव कसबे में 3 अगस्त 1886 को रामचरण सेठ के घर पैदा हुए बालक का नाम रखा गया मैथिली शरण गुप्त। मां काशीबाई काफी धार्मिक और सुशिक्षित थीं, इस कारण मैथिलीशरण पर भी धर्म और राष्ट्रभक्ति की गहरी छाप रही। पिता बृज भाषा में कविताएं लिखते थे, जिससे बालक का रुझान साहित्य की ओर हो गया।
राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त के पौत्र सौरभ गुप्त का कहना है कि उनके दद्दा जी कासाहित्य जहां नारी संवेदना के लिए समर्पित रहा वहीं, राष्ट्रभक्ति का भी प्रतिनिधित्व करता है। उन्होंने बताया कि उनकी कृति यशोधरा में गौतम बुद्ध के घर छोड़कर जाने के बाद यशोधरा का जो विरह वर्णन किया गया है वह नारी मन की व्यथा को व्यक्त करता है। उन्होंने लिखा है, अबला जीवन हाय, तुम्हारी यही कहानी, आंचल में है दूध और आंखों में पानी। गौतम बुद्ध के चुपचाप रात में घर छोड़कर चले जाने पर मैथिली शरण गुप्त ने यशोधरा की विरही मनोदशा और नारी मन की दृढ़ता का वर्णन करते हुए लिखा है, सखी वो मुझसे कहकर तो जाते, कहते तो क्या मुझको पथ बाधा में पाते। इतना ही नहीं साकेत में उर्मिला का विरह वर्णन तथा रत्नावली की रचना में नारी मन की दृढ़ता का चित्र उकेरा गया है। इसके अलावा पंचवटी, भारत भारती, झंकार, विश्ववेदना. जयद्रथ वध, तिलोत्तमा रंग में भंग व साकेत जैसी कृतियों की रचना मैथिली शरण गुप्त ने की।
चिरगांव की बड़ी बखरी में था देश के बड़े साहित्यकारों का आना जाना
चिरगांव में स्थित मैथिली शरण गु्प्त के मकान को लोग बड़ी बखरी के नाम से जानते हैं। उनकी पुत्रवधू शांति गुप्त बताती हैं कि जब दद्दा जीवित थे तब हरिवंश राय बच्चन, अज्ञेय, महादेवी वर्मा का बड़ी बखरी में आना जाना लगा रहता था। साहित्यिक गोष्ठियां भी जमा करती थीं। 23 नवंबर 1929 को महात्मा गांधी भी मैथिली शरण गुप्त के घर के सदस्य की तरह ही रहने वाले साहित्यकार मुंशी अजमेरी के आमंत्रण पर चिरगांव राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त के आवास पर आए थे। महात्मा गांधी ने ही गुप्त जी के पचासवें जन्मदिन पर उन्हें राष्ट्रकवि की उपाधि से अलंकृत किया था। गुप्त जी को पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया गया।
हर श्रावण पर राखी बांधने आती थीं महादेवी वर्मा
मैथिली शरण गुप्त की पुत्रवधू शांति गुप्त बताती हैं कि देश की ख्यातिनाम कवयित्री महादेवी वर्मा हर श्रावण पर दद्दा को राखी बांधने चिरगांव आती थीं। जब कभी वे नहीं आ सकीं तो दद्दा उनके पास राखी बंधवाने पहुंच जाते थे। यह बहन भाई का रिश्ता जीवन पर्यंत चलता रहा। हम सब उन्हें बुआ कहते थे।
उर्मिला जी से प्रभावित होकर रख दिया बेटे का नाम उर्मिल चरण
मैथिली शरण गु्प्त की पुत्रवधू शांति गुप्त बताती हैं कि साकेत की पात्र लक्ष्मण जी की पत्नी उर्मिला के त्याग और तपस्या से गुप्त जी इस कदर प्रभावित थे कि उन्होंने अपने बेटे का नाम उर्मिल चरण रख दिया। मैथिली शरण गुप्त अपना काव्य गुरु महावीर प्रसाद द्विवेदी को मानते थे, उनके ही सानिध्य में उन्होंने सरस्वती पत्रिका में अपनी रचनाएं प्रकाशित करवा कर अपनी साहित्य यात्रा प्रारंभ की थी।
रक्तमुखी की छांव में करें एमपी वास...
चिरगांव निवासी साहित्यकार रामप्रकाश गुप्ता बताते हैं कि दद्दा बारह वर्ष तक राज्यसभा सांसद रहे। इसी दौरान एक दिन दिल्ली में उनसे मिलने हजारी प्रसाद द्विवेदी पहुंच गए। उनके आवास पर लगी एक लता में लाल फूल खिले देखकर उन्होंने गुप्त जी से चुहल करते हुए दोहा की एक लाइन पढ़ी, रक्तमुखी की छांव में करें एमपी वास। वे अगली लाइन बोल पाते इसके पहले ही गुप्त जी ने दोहा को पूरा करते हुए कहा, चार माह की वृत्ति पर काटें बारह मास। माजरा यह था उस दौरान सांसदों को सिर्फ जब तक सत्र चलता था तब तक का ही मानदेय मिलता था। इस तरह चार माह का ही मानदेय मिल पाता था। बाद में यह दोहा नेहरु जी को सुनाया गया तो उन्होंने तत्काल सांसदों को वर्ष भर का मानदेय देने की घोषणा कर दी, इस तरह दो साहित्यकारों की चुहलबाजी में सांसदों का भला हो गया।
जो भरा नहीं भावों से बहती जिसमें रसधार नहीं, वह हृदय नहीं है पत्थर है जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं ..
राष्ट्रकवि के पौत्र सौरभ बताते हैं कि मैथिली शरण गुप्त ने भारत भारती की रचना कर देश को राष्ट्र भक्ति का संदेश दिया। जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है वह नर नहीं नर पशु निरा और मृतक समान है, जो भरा नहीं भावों से बहती जिसमें रसधार नहीं, वह हृदय नहीं है पत्थर है जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं । देश की गुलामी से लेकर आजादी तक के हालातों पर दद्दा ने बड़े ही बेबाकी से अपनी कलम चलाई। देश की आजादी के बाद देश के आर्थिक हालात बेहद खराब थे तब दद्दा ने लिखा, नर न निराश करो मन को , कुछ काम करो , कुछ काम करो, जग में रहकर कुछ नाम करो। लोगों को देश के विकास के लिए प्रेरित करने के लिए उस दौर में उन्होंने लिखा, संदेश नहीं में यहां स्वर्ग का लाया हूं, इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया हूं। सौरभ बताते हैं कि दद्दा ने उस दौर में लोगों को भारत के सोने की चिड़िया होने का भी अहसास कराते हुए लिखा, हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी, आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएं सभी।
राम तुम्हारा वृत स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बन जाए सहज सम्भाव्य है..
राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त की पुत्रवधू श्रीमति शांति गुप्ता (काकी) बताती हैं कि साकेत की रचना गुप्त जी के लिए एक चुनौती थी। बुंदेलखंड की ही धरती पर जन्मे गोस्वामी तुलसी दास का रामचरित मानस और ओरछा में जन्मे महाकवि केशव की रामचंद्रिका दो बड़े ग्रंथ श्रीराम के चरित पर लिखे जा चुके थे। मैथिली शरण जी ने साकेत में इसीलिए लिखा है, राम तुम्हारा वृत स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बन जाए सहज सम्भाव्य है। उन्होंने लक्ष्मण और उनकी पत्नी उर्मिला को केंद्रित कर साकेत की रचना की।
प्राण न पागल हो तुम यूं, धरती पर है अब मोह कहां, मोहमयी छलना भर है..
राष्ट्रकवि की पुत्रवधू शांति गुप्ता बताती हैं कि 12 दिसंबर 1964 का दिन भी आम दिनों की ही तरह था, दद्दा नये वाले मकान में साहित्य साधना कर रहे थे। पर, यह पता नहीं था कि आज लिखी जाने वाली कविता उनकी आखिरी रचना होगी। मृत्यु से दो घंटे पहले उन्होंने लिखा, प्राण न पागल हो तुम यूं, धरती पर है अब मोह कहां, मोहमयी छलना भर है, भटकों न अहो तुम और यहां। यूं इसके पहले भी उन्होंने मृत्यु को चुनौती देते हुए कविता लिखी थी, विचार लो कि मर्त्य हो, न मृत्यु से डरो कभी, मरो, परंतु यों मरो, कि याद जो करें सभी। दुनिया को मृत्यु से न डरने का संदेश देने वाले काव्य के चितेरे को हृदयघात हुआ और वह पंचतत्व में विलीन हो गए।