झांसी। वोट देंगे, लेकिन मजदूरी तो दिलाइये। आश्वासन के भरोसे कब तक रहें। चुनाव के बाद तो आप लोगों के दर्शन भी दुर्लभ हैं। मनरेगा मजदूरों के ऐसे सवाल पर प्रत्याशी और उनके समर्थकों के पास बगलें झांकने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। वहीं, अतिवृष्टि और ओलावृष्टि के शिकार किसान मुआवजे को लेकर दिए जा रहे आश्वासन पर विश्वास करने को तैयार नहीं हैं। वोट के लिए झोली फैलाए आने वाले प्रत्याशी उन्हें अपने पाले में डालने के लिए हरसंभव कोशिश कर रहे हैं, लेकिन किसान फिलहाल चुप्पी तोड़ने को तैयार नहीं हैं।
ओलावृष्टि ने न केवल सीमांत किसान बल्कि बड़े काश्तकारों को भी बर्बाद कर दिया है। अस्सी फीसदी नुकसान के बाद भी सरकारी कर्मियों व अफसरों की मनमानी के कारण सरकारी तौर पर सिर्फ तीस से चालीस फीसदी क्षति माने जाने के कारण धरती पुत्रों में खासा आक्रोश है। लामबंद हुए किसान संगठन इस बार नेताओं को सबक सिखाने का मन बना चुके हैं। दैवीय आपदा के बाद शेष बची गेहूं व चना की फसल को घर तक ले जाने के लिए किसान खेत खलिहानों पर दिन- रात एक कर रहे हैं। यही वजह है कि चुनाव प्रचार में पहुंचने वाले लोगों को खास तवज्जो नहीं मिल रही हैै। प्रत्याशी व उनके समर्थक चमचमाती गाड़ियों से गांवों में पहुंचकर अपने आप को किसानों का सबसे बड़ा हमदर्द बता रहे हैं, इसके बाद भी वे धरती पुत्रों की नब्ज नहीं समझ पा रहे हैं। उधर, मनरेगा समेत अन्य योजनाओं के तहत कराए गए कार्यों की मजदूरी नहीं मिलने से श्रमिकों की नाराजगी का भी प्रत्याशियों को सामना करना पड़ रहा है। वोट की बात करने से पहले ही ग्रामीण अपनी लटकी हुई मजदूरी दिलाने का सवाल दाग देते हैं, ऐसे में प्रत्याशी व समर्थकों के पास दिलासा देने के अलावा कोई चारा नहीं बचता है। मजदूरों को चुनाव के बाद उनका रुका हुआ पारिश्रमिक दिलाने का वादा तो किया जा रहा है पर गांव के लोग नेताओं के इन आश्वासनों पर ज्यादा भरोसा करने को तैयार नहीं हैं।
गौरतलब है कि झांसी- ललितपुर संसदीय क्षेत्र में सर्वाधिक ओलावृष्टि झांसी जिले के मोंठ तहसील में हुई थी। करीब दो सैकड़ा गांवों के किसानों की फसलें तहस- नहस हो गई थी। इसी दौरान, ललितपुर जिले की सदर तहसील क्षेत्र व तालबेहट तहसील के करीब एक सैकड़ा गांवों में ओलावृष्टि ने किसानों को बर्बाद कर दिया था। अफसरों से लेकर जनप्रतिनिधियों तक ने मौके पर पहुंचकर किसानों को ढांढस बंधाया, अधिक से अधिक क्षतिपूर्ति राशि दिलाने का भरोसा भी दिलाया पर जब सरकारी अमले ने क्षतिपूर्ति की रिपोर्ट भेजी तो अस्सी के स्थान पर सिर्फ तीस फीसदी ही नुकसान माना गया। अफसरों के इस रवैये पर किसी भी पार्टी के लोगों ने तब विरोध या आंदोलन नहीं किया था।