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दो साल बाद भी घोटालेबाज 86 अफसरों-कर्मचारियों पर कार्रवाई नहीं

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झांसी। जलसंस्थान में वर्षों पहले हुए भुगतान में गड़बड़ी की जांच के बाद भी दोषी अफसरों और कर्मचारियों पर कार्रवाई नहीं हुई है। 41.95 करोड़ रुपये का घपला करने वालों की पूरी कारगुजारी सतर्कता विभाग ने शासन को भी बता दी, लेकिन दो साल बाद भी कुछ नहीं हो सका।
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जलसंस्थान में एक अप्रैल 2005 से 31 मार्च 2017 तक के भुगतानों में हुई वित्तीय अनियमितताओं की जांच विजिलेंस ने की थी। इस अवधि में विजिलेंस ने सवा लाख पन्नों की रिपोर्ट तैयार की थी। रिपोर्ट के अनुसार 508 करोड़ रुपये के बजट में से 126 करोड़ से सामग्री की आपूर्ति और 292 करोड़ रुपये से मरम्मत का कार्य कराया गया था। बाकी बजट वेतन, पेंशन और अन्य भुगतानों में खर्च हुआ था। इसी बजट में घालमेल हुआ था। विजिलेंस की रिपोर्ट के मुताबिक अफसरों ने फर्जी बिलों पर करीब चालीस फीसदी भुगतान किया। इस मामले में विजिलेंस ने पूरे कामों का एस्टीमेट मांगा था, लेकिन विभाग उपलब्ध नहीं करा सका। विजिलेंस के अधिकारियों ने तत्कालीन महाप्रबंधकों को कई बार पत्र लिखकर विभिन्न एस्टीमेट मांगे थे लेकिन कोई जानकारी नहीं मिल सकी थी।
पूरी जांच में 41.95 करोड़ रुपये के घोटाले की पुष्टि हुई। इसमें महाप्रबंधक, अधिशासी अभियंता, सहायक अभियंता, अवर अभियंता समेत अन्य अधिकारी समेत कुल 86 अफसर और और कर्मचारी दोषी पाए गए। विजिलेंस ने जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करने के लिए पूरी रिपोर्ट शासन को 31 दिसंबर 2019 को भेज दी थी। लेकिन, तब से लेकर अब तक इस मामले में कार्रवाई आगे नहीं बढ़ी है।
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गृह विभाग को पत्र लिखकर की कार्रवाई की मांग
जलसंस्थान कर्मचारी यूनियन के पूर्व जिला महामंत्री संजीव साहू ने शासन के अपर मुख्य सचिव गृह एवं सतर्कता विभाग को पत्र लिखकर दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने मांग की है कि जांच हुए काफी समय बीत गया है। फाइल शासन में लंबित है। दोषियों पर कार्रवाई की जाए।
यह था मामला
जलसंस्थान ने पाइप सर्किट, सलूस वाल्व समेत अन्य सामग्री कोलकाता, जयपुर, जालंधर की कंपनियों से मंगाकर भुगतान किया था। जब विजिलेंस ने जांच की तो पता चला कि चालीस फीसदी फर्जी बिल लगाए गए थे। मुंबई और हैदराबाद की कंपनियों से ब्लीचिंग और फिटकरी खरीदी गई थी। जांच में पता चला कि कंपनी ने फिटकारी व ब्लीचिंग को कम दामों में सप्लाई की थी। विजिलेंस ने सवाल उठाया कि कम दामों में सप्लाई क्यों की गई थी। एक कंपनी ने दो कंपनी के नाम से सप्लाई की थी।
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यह मामला उनके समय का नहीं है। जो भी निर्णय होगा शासन स्तर से होगा।
- कुलदीप सिंह, अधिशासी अभियंता
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