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रानी के झांसी से जाने के 75 साल बाद खुला था भांडेरी गेट का ताला

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झांसी। वैसे तो झांसी के कण-कण में वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई की यादें बसी हुई हैं। लेकिन, महानगर में कई ऐसी ऐतिहासिक धरोहर हैं, जिनका उल्लेख झांसी के इतिहास में प्रमुखता से मिलता है। इन्हीं में से एक है भांडेरी गेट। जी हां, ये वो दरवाजा है, जिससे गदर के दरम्यान रानी अपनी झांसी छोड़कर गईं थीं और उसके बाद वे वापस नहीं लौटीं। रानी के जाने के 75 साल बाद तक ये दरवाजा बंद बना रहा था। इसके बाद इसे खोला गया था।
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स्वराज्य की खातिर सन 1857 में हुए संग्राम में अंग्रेजी सेना ने झांसी को चारों ओर से घेर लिया था। लेकिन, रानी के शौर्य और कुशल सैन्य नेतृत्व की वजह से अंग्रेजी सेना झांसी में प्रवेश नहीं कर पा रही थी। झांसी राज्य की सैन्य टुकड़ी हर मोर्चे पर फिरंगियों के दांत खट्टे कर रही थी। लेकिन, रानी के सिपहसलार दूल्हाजू की गद्दारी की वजह से ओरछा गेट से फिरंगी सेना झांसी में प्रवेश कर गई थी। कई दिनों तक भयंकर संग्राम हुआ और रानी की तलवार दुश्मन सेना का लहू पीती रही। लेकिन, लंबे युद्ध की वजह से संसाधन कम पड़ने लगे थे। झांसी राज्य की सैन्य ताकत भी कम होती जा रही थी। ऐसे में रानी को अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए कालपी को ओर कूच करना पड़ा। रानी ने महानगर के परकोटे में बने भांडेरी गेट से निकलकर झांसी को छोड़ा था। चार अप्रैल 1858 की मध्य रात्रि वे इसी गेट से निकलीं थीं और इसके बाद दरवाजों पर ताला डाल दिया गया था। भनक लगने पर फिरंगी सेना भी यहां पहुंच गई थी, लेकिन नगर के लोग सैनिक बनकर फिरंगी सेना पर टूट पड़े थे और उन्होंने इस दरवाजे को खुलने नहीं दिया था। रानी के जाने के 75 साल बाद सन 1933 में ये दरवाजा खोला गया, जो आज भी झांसी के गौरवपूर्ण इतिहास का गवाह बना हुआ है।
गणेश मंदिर: यहां मनु बनी थी लक्ष्मीबाई
झांसी। गणेश मंदिर को झांसी के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। ये वही स्थान है जहां बिठूर की कन्या मनु लक्ष्मीबाई बनी थी। गणेश मंदिर में मनु (मणिकर्णिका) का विवाह झांसी के राजा गंगाधर राव के साथ हुआ था। शादी के बाद महाराष्ट्रीयन परंपरा के अनुसार यहीं उनका नाम बदलकर लक्ष्मीबाई रखा गया था। कालांतर में ये नाम समूची दुनिया में नारी अस्मिता का प्रतीक बनकर उभरा।
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लक्ष्मी मंदिर: कुलदेवी का आशीष ले टूट पड़ीं थी संग्राम में
झांसी। वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई का लक्ष्मी ताल के पास स्थित लक्ष्मी मंदिर से गहरा नाता रहा है। वे नियमित यहां मां के दर्शन करने जाती थीं। इसी दरम्यान वे शहर का हालचाल भी जान लेती थीं और राज्य के नागरिकों से सीधा संवाद भी करती थीं। कहा जाता है कि कुल देवी के नाम पर ही शादी के बाद रानी का नाम लक्ष्मीबाई रखा गया था। अंग्रेजों से हुए संग्राम से पहले रानी ने कुलदेवी का आशीर्वाद लिया था।
किला: आज भी बयां करता है शौर्य की दास्तां
झांसी। रानी लक्ष्मीबाई के इतिहास में किले का महत्वपूर्ण स्थान है। इतिहास की ये विरासत 1857 के संग्राम की आज भी गवाही देता नजर आता है। इसका निर्माण बंगरा नामक पहाड़ी पर ओरछा के राजा वीरसिंह जूदेव ने 1613 से 1619 के बीच कराया था। बुंदेलाओं के बाद किले पर मुगलों का भी आधिपत्य रहा। बाद में ये किला मराठाओं के पास आया। अंग्रेजों के खिलाफ 1857 के संग्राम का ये किला केंद्र बिंदु रहा।
रानी महल: यहां बुना गया था गदर का तानाबाना
झांसी। पहले तो रानी का निवास किले में स्थित पंच महल हुआ करता था। लेकिन, किला अंग्रेजों के आधिपत्य में शामिल होने के बाद रानी का निवास किले के समीप स्थित महल हो गया था। तब से इसे रानी महल कहा जाने लगा। यहीं रहकर रानी ने अंग्रेजों के खिलाफ संग्राम का तानाबाना बुना था। रानी के बल की निशानी इस महल में आज भी मौजूद है। क्रोध में आकर रानी ने तलवार चलाई थी, जो महल के खंभे में लगी थी। खंभे पर तलवार के चिह्न अब भी मौजूद हैं।
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