झांसी। मरे हुए जानवरों के मांस को खाकर पर्यावरण को शुद्ध करने वाले गिद्धों की संख्या में लगातार कमी होती जा रही है। वन विभाग की ओर से जिले भर के गिद्धों की गणना की गई है। जिसमें जिले में कुल तीन जगहों पर 67 गिद्ध पाए गए हैं। जबकि वर्ष 2011 की गणना में जिले में सौ गिद्ध पाए गए थे।
पर्यावरण संतुलन में सहायक व प्रकृति का सफाई कर्मचारी कहे जाने वाले गिद्धों का वंश लगातार कम होता जा रहा है। आलम यह है कि जिले भर में कुल 67 गिद्ध ही मिल सके हैं। वन विभाग की ओर से जिले भर में गिद्धों की गणना की गई। इसके लिए विभाग द्वारा कई टीमों का गठन किया गया था। टीमों द्वारा जिले भर में गिद्धों की तलाश की गई। इसमें मोठ में सबसे अधिक 50, बबीना में 15 व मऊरानीपुर में सिर्फ 2 ही गिद्ध मिले हैं। जो पिछली गणना के मुताबिक काफी कम पाए गए हैं। इस संबंध में डीएफओ वीके मिश्रा ने बताया कि गिद्धों की संख्या में कमी का मुख्य कारण डिक्लोफेनाक दवा के साथ ही पर्यावरण परिवर्तन है। जिसके चलते गिद्धों की संख्या में कमी देखने को मिल रही है।
जानवरों को दी जाने वाली दवा बन रही काल
दर्द निवारक दवा डिक्लोफेनाक गिद्धों के लिए काल साबित हो रही है। इस दवा का सेवन कर मर चुके मवेशियों के मांस को खाने से गिद्धों के शरीर के अंग हृदय व किडनी काम करना बंद कर देते हैं, जिससे उनकी मौत हो जाती है। गिद्धों की तेजी से घटती संख्या के चलते जानवरों के लिए इस दवा का उपयोग पूर्णत: प्रतिबंधित कर दिया गया था। बावजूद, पशु मेडिकल स्टोरों पर यह दवा धड़ल्ले से बेची जा रही है।