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डॉक्टर्स डे : 63 सर्पदंश पीड़ित समय पर उपचार कराने पहुंचे तो बच गई जान, झाड़फूंक में उलझे तो चली गई सात की जान

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अमर उजाला ब्यूरो

झांसी। हताशा और नाउम्मीद से व्याकुल परिजन एक माह में करीब 70 सर्पदंश पीड़ितों को मेडिकल कॉलेज की इमरजेंसी लेकर पहुंचे। डॉक्टरों ने तुरंत उपचार देकर करीब 63 लोगों की जान बचा ली। बाकी लोगों की मौत की वजह झाड़-फूंक में पांच से छह घंटे तक बर्बाद करना रहा।

बुंदेलखंड में बारिश के मौसम में सर्पदंश पीड़ितों का ग्राफ बढ़ता है। इससे सर्पदंश रोगियों की संख्या बढ़ जाती है। जागरुकता के अभाव में तमाम लोग झाड़-फूंक कराने की वजह से रोगी की जान जोखिम में डालते हैं, जो मौत का कारण बनती है। मेडिकल इमरजेंसी ऑफिसर डॉ. हरनारायण ने बताया कि एक माह में करीब 70 सर्पदंश पीड़ित आए। अथक प्रयास करके करीब 63 रोगियों को बचा लिया गया, जबकि झाड़-फूंक में समय बर्बाद करने की वजह से सात को नहीं बचा सके। उन्होंने बताया कि सर्पदंश पीड़ितों को तत्काल एंटी वेनम इंजेक्शन के साथ ऑक्सीजन बेड पर रखते हैं ताकि सांस लेने में दिक्कत न हो। एंटीबायोटिक इंजेक्शन भी देते हैं ताकि सांप काटने से शरीर में पहुंचा संक्रमण न फैले।
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पांच वर्षीय बच्ची के पित्ताशय से निकाली पथरी



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मेडिकल कॉलेज के चिकित्सक डॉ. पंकज सोनकिया ने सोमवार को पांच वर्षीय बच्ची के पित्ताशय (पित्त की थैली) का सफल ऑपरेशन किया है। चिरगांव की पांच वर्षीय सौम्या को एक साल से दर्द की दिक्कत थी। जांच में पता चला कि उसके पित्ताशय में पथरी है। बच्ची होने की वजह से कोई भी ऑपरेशन का रिस्क नहीं ले रहा था। शुक्रवार को परिजन मेडिकल कॉलेज लेकर आए, जहां डॉ. पंकज ने ऑपरेशन का मशविरा दिया। परिजनों की सहमति पर पित्ताशय को मय पथरी निकाला गया।

0- कैंसर रोगियों की भी बचाई जान

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कैंसर रोग विभागाध्यक्ष डॉ. सचिन माहुर ने बताया कि मेडिकल कॉलेज में एक वर्ष के अंदर कैंसर की प्रथम स्टेज के करीब 100, द्वितीय स्टेज के करीब 125 व तीसरी स्टेज के करीब 225 मरीज आ चुके हैं। रेडियोथेरेपी व दवाओं से प्रथम स्टेज के 70 फीसदी व द्वितीय स्टेज के 40 फीसदी रोगियों को ठीक किया गया है। तृतीय स्टेज के गंभीर रोगियों का सिम्टोमैटिक (लक्षण) उपचार किया गया।

0- गरीब रोगी के लिए तन-मन-धन से सेवा



त्वचा रोग की दवाएं काफी महंगी होती है। ओपीडी में कई रोगी ऐसे आते हैं, जिनके पास दवाएं खरीदने तक के रुपये नहीं होते हैं। ऐसे में विभागाध्यक्ष डाॅ. नीरज श्रीवास्तव दवाएं मंगाकर रोगियों को देते हैं ताकि उनके उपचार में कोई दिक्कत नहीं आए।



0- पैसे की वजह से उपचार नहीं रुके, यही मकसद

बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. ओमशंकर चौरसिया बताते हैं कि एसएनसीयू में भर्ती शिशुओं की दवाएं मेडिकल कॉलेज में हैं। फिर भी कभी ऐसे भी बच्चे भर्ती हो जाते हैं, जिनकी दवाएं मंगाने की जरूरत होती है। अधिकांश लोग तो दवा लेकर दे देते मगर कुछ लोग आर्थिक स्थिति न होने की वजह से इन्कार कर देते हैं। ऐसे में अपने स्तर से उपचार करना पड़ता है। वह बताते हैं कि मई में जिला अस्पताल की ओपीडी में जन्मी बेटी को एसएनसीयू में भर्ती किया गया। मां कुछ बता नहीं पा रही थी, ऐसे में बच्ची को जरूरी इंजेक्शन लगाने थे, जो अपने खर्च पर लगवाएं।

0- रोबोटिक सर्जरी हुई तो वृद्ध करने लगा खेतीबाड़ी

चिरगांव के 70 वर्षीय सुरेश साहू के घुटनों में टेड़ापन आ गया। दर्द इतना ज्यादा कि वह कोई काम नहीं कर पा रहा था। कई डॉक्टरों को दिखाया मगर आराम नहीं मिला। घुटनों का टेड़ापन बढ़ता रहा था। चलना-फिरना तो दूरी नित्य कार्य करना भी बंद हो गया। उन्होंने दिसंबर 2024 में रोबोटिक सर्जन डॉ. गौरव गुप्ता से परामर्श लिया। डॉ. गौरव ने रोबोटिक सर्जरी से घुटनों का प्रत्यारोपण किया। इससे घुटने का टेड़ापन खत्म हुआ और अब सारा काम खुद करते हैं।
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0- रिकॉर्ड आंखों के ऑपरेशन

जिला अस्पताल में सालभर में सबसे ज्यादा आंखों के सफल ऑपरेशन हुए। नेत्र रोग विभाग में तैनात डॉक्टरों का एक अप्रैल 2024 से 30 मई तक ऑपरेशन करने का आंकड़ा चौकाने वाला है। डॉ. लक्ष्मी प्रसाद ने 5033, डॉ. गौरव सेठ ने 4236 तथा डॉ. विनोद यादव ने 4785 ऑपरेशन किए हैं।
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