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हरियाली तीज झूला परंपरा-City

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मंदिरों तक सिमट गयी झूलों की परंपरा
सब हेड - हरियाली तीज पर झूलों में विराजमान होंगे भगवान
- पहले सावन की शुरुआत में ही पेड़ों पर झूले डल जाते थे
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी।
मंदिरों में हरियाली तीज (13 अगस्त) पर भगवान के दिव्य विग्रह झूलों में विराजमान होेंगे। कई मंदिरों में पवित्रा एकादशी पर भी झूले डाले जाएंगे। इसकी तैयारियां जोरों पर हैं। महिलाओं के मुताबिक झूला डालने की परंपरा अब सिर्फ मंदिरों तक सीमित होकर रह गयी है। जबकि, पहले सावन की शुरुआत में ही पेड़ों पर झूले डल जाते थे।
उमंग, उल्लास और प्राकृतिक सुंदरता के मौसम सावन में झूला झूलने का आनंद ही कुछ अलग है। कुछ वर्ष पहले तक सावन का इंतजार महिलाओं और लड़कियों में खासा होता था। लेकिन बदलते वक्त, एकल परिवारों का चलन और सीमित जगह के अभाव से झूला झूलने का आनंद लगातार कम होता गया।
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लगभग एक दशक पहले तक हर पेड़ पर झूले नजर आते थे। लेकिन अब दूर-दूर तक यह दिखायी नहीं देते हैं। हालांकि समृद्ध परिवार के लोग जरूर अब घर सजाने के लिए लोहे, स्टील व आकर्षक गद्दे से बने झूले, तो बच्चों को झुलाने के लिए प्लास्टिक से बने झूले इस्तेमाल में ला रहे हैं। वहीं, झूला झूलने का रिवाज समाजसेवी संस्थाओं के कार्यक्रम में रह गया।

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द्वापर युग से है परंपरा
झूला डालने की परंपरा द्वापर युग से है। मान्यता है कि भगवान कृष्ण और राधा जी की रासलीला में झूले का बड़ा महत्व है। इसी के चलते मंदिरों में सावन मास में झूला डालने की परंपरा है जो रक्षाबंधन तक रहता है। इस दौरान झूला गीत भी भक्तों द्वारा गाये जाते हैं। कई जगह चाचर व डांडिया नृत्य भी होता है। महिलायें हरी साड़ी पहनकर पूजा करती हैं। नवविवाहित महिलायें मायके में झूला झूलती हैं।

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आकर्षक झूले बिक रहे हैं बाजार में
बाजार में आकर्षक झूले बिक रहे हैं। इनमें बच्चों के लिए प्लास्टिक झूले हैं, वहीं, फर्नीचर शोरूम में स्टील की पाइप, लकड़ी और मेक्रम से बने झूले हैं। जो आर्डर पर भी तैयार हो रहे हैं। छोटे झूलों में नेट, गोटापत्ती, जरी, कुंदन से आकर्षक डिजाइन बनायी जा रही हैं। जो पांच सौ रुपये से शुरू हैं। वहीं, नक्काशी और सादा डिजाइन के झूलों की रेंज 5 हजार रुपये से शुरू है।


अब पेड़ ही नहीं रह गये झूला डालने को
बचपन में सभी सहेलियां झूला झूलने के लिए इकठ्ठा होती थीं। आंगन में लगे पेड़ों पर झूले बांधे जाते थे। लेकिन अब मुहल्लों में पेड़ ही नहीं रह गये हैं। झूले अब मंदिरों तक सीमित होकर रह गये हैं।
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इंदिरा गुप्ता प्रधानाचार्या पं. कृष्णचंद्र शर्मा कन्या इंटर कॉलेज निवासी टकसाल

आज सब बदल गया
सावन में हर मंदिर में झूला लगता है। सभी लड़कियां व महिलायें झूलने और पिक निक मनाने के लिए जाती थीं। आज यह सब बदल गया है।
अनीता साहू, शिक्षिका निवासी दतिया गेट बाहर

संस्कृति व पर्यावरण बचाना जरूरी
पहले आम के पेड़ों पर झूले लगते थे। बहुतायत रूप से पेड़ लोगों ने काट दिये हैं। जरूरत है कि हम अपनी संस्कृति व पर्यावरण को बचाएं।
भूमिका निवासी पंचकुइयां

बचपन हमेशा प्रकृति के बीच बीतना चाहिए
सावन में झूला झूलने का काफी महत्व है। इससे शारीरिक व मानसिक तनाव नहीं रहता। बच्चों का बचपन हमेशा प्रकृति के बीच बीतना चाहिए।
वैशाली पुंशी, निवासी पीतांबरा कॉलोनी

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महिलाओं ने झूले का लिया आनंद
झांसी।
कोहिनूर ऑलवेज ब्राइट ने सावन के हरियाली तीज के उपलक्ष्य में कार्यक्रम आयोजित किया। आया सावन झूम के अंतर्गत पीतांबरा कॉलोनी के पार्क में महिलाओं ने झूले का आनंद लिया। वैशाली पुंशी की अध्यक्षता में हुए कार्यक्रम में सह सचिव भूमिका सिंह ने कहा कि झूला झूलने से शरीर का व्यायाम हो जाता है। मन भी प्रसन्न रहता है। फाबिहा खान ने कहा कि हरी चूड़ियां और मेहंदी संपन्नता व हरियाली का प्रतीक हैं। सिमरन चड्ढा ने कहा कि सावन में शिव की आराधना का विशेष महत्व है। कार्यक्रम में पूजा सुंदरानी, अंचला पटेल, दिव्या सक्सेना, नेहा अग्रवाल, रोश्नी, प्रीति पांडेय आदि मौजूद रहीं।

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