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केन- बेतवा गठजोड़: तीन साल पहले मालूम था होगी लड़ाई-City

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सरकारों को पता था फंसेगा पानी का बंटवारा
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केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना का नहीं निकाला हल
बुंदेलखंड क्षेत्र के यूपी तीन व एमपी के तीन जिलों को दिया जाना हैं पानी
19 हजार करोड़ रुपये की लागत से बननी हैं 221 किलोमीटर लंबी कंक्रीट नहर
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी।
बुंदेलखंड के सूखे खेतों को पानी देने के लिए जल संसाधन विभाग का ड्रीम प्रोजेक्ट केन-बेतवा लिंक परियोजना पानी के बंटवारे को लेकर फिर अधर में लटक गई है। ऐसा नहीं कि यह बात दोनों सरकारों को पहले से मालूम नहीं थी, लेकिन समय से प्लानिंग बनाने की जगह वक्त का इंतजार होता रहा। अब जब परियोजना को धरातल पर उतारने की स्थिति बनी तो विवाद पानी को लेकर खड़ा हो गया।
नौ हजार करोड़ रुपये की योजना जो अब 19 हजार पर पहुंच गई है, जिससे मध्यप्रदेश के तीन और उत्तर प्रदेश के तीन जिलों की 6,35,661 हेक्टेयर भूमि सिंचित होना हैं। योजना के मुताबिक बांदा व छतरपुर जिले की सीमा पर बोधन गांव के निकट गंगोई बांध से केन नदी को तीस मीटर चौड़ी कंक्रीट नहर बनाकर आगे ले जाना है। धसान नदी पर एक टर्नल (सुरंग) बनाकर आगे बढ़ाया जाएगा। छतरपुर के हरपालपुर से होकर यूपी के मऊरानीपुर बार्डर से एमपी के जतारा तहसील के गांवों से होकर इस नहर को बरुआसागर डैम के ऊपर से ओरछा के नीचे स्थित नोटघाट पुल में मिला दिया जाएगा। नहर एमपी-टू एमपी होगी या फिर उत्तर प्रदेश की जमीन से भी निकाली जाएगी, इस सवाल पर जल संसाधान विभाग के उच्चस्थ सूत्र फिलहाल कुछ भी नहीं बता रहे हैं, लेकिन यह बात वह साफ कर रहे हैं कि नहर का पूरा डूब व प्रभावित क्षेत्र मध्यप्रदेश में ही है, जबकि प्रोजेक्ट रिपोर्ट में यूपी में डूब या प्रभावित क्षेत्र शून्य दर्शाया गया है।
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उत्तरप्रदेश की धरती पर जब प्रभावित क्षेत्र है ही नहीं तो सहज अंदाज लगाया जा सकता है कि यह नहर यूपी के बार्डर को छूकर एमपी से ही निकलेगी। इससे साफ है कि पानी का अधिक फायदा मध्य प्रदेश को ही होने वाला है। मगर, इसके बाद भी मध्य प्रदेश सरकार ने पानी बंटवारे को लेकर परियोजना में फिर बाधा उत्पन्न कर दी है।

इस तरह बंटना है पानी
मध्यप्रदेश के छतरपुर, टीकमगढ़ व पन्ना जिले में अब तक सिंचित क्षेत्र का कुल रकबा 2 लाख 87 हजार 842 हेक्टेयर था, जो इस नहर के बन जाने के बाद 3 लाख 69 हजार 881 हेक्टेयर हो जाएगा। इसी तरह उत्तर प्रदेश के बांदा, महोबा व झांसी जिले में अब तक सिंचित रकबा 2 लाख 27 हजार 373 हेक्टेयर है यह बढ़कर दो लाख 65 हजार 780 हो जाएगा। आंकड़ों को देखकर ही यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसका लाभ यूपी को एमपी की अपेक्षा काफी कम मिलेगा।

लिंक परियोजना में किसे नफा किसे नुकसान
केन-बेतवा लिंक परियोजना का भले ही यूपी व एमपी की जगह बुंदेलखंड को दृष्टिगत रखते हुए प्रोजेक्ट तैयार किया गया हो पर हकीकत के धरातल पर जो आंकड़े सामने आ रहे हैं, उसमें उत्तरप्रदेश का सिंचिंत रकबा मध्यप्रदेश के मुकाबले आधे से भी कम बढ़ रहा है। एमपी में जहां एक लाख हेक्टेयर से अधिक सिंचित रकबा बढ़ेगा तो वहीं यूपी को तीस से चालीस हेक्टेयर रकबे का ही लाभ होने की उम्मीद है। हालांकि, जल संसाधान मंत्रालय इसके लिए बुंदेलखंड की भौगोलिक स्थिति को जिम्मेदार मानता है। इतना ही नहीं केन नदी से होने वाली बांदा शहर की जलापूर्ति भी इस परियोजना के शुरू होने के बाद गड़बड़ाने की आशंका है।

ये बात पहले की आई थी सामने
अगस्त 2014 में केन-बेतवा लिंक परियोजना को लेकर जल जन जोड़ो अभियान के राष्ट्रीय संयोजक संजय सिंह ने कहा था कि दो प्रांतों के बीच से निकलने वाली इस नहर से पानी को लेकर दोनों प्रदेशों में सिंचाई के झगड़े बढ़ने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है। जिस तरह राजघाट की दतिया नहर निकलती तो यूपी के बबीना से है पर इसका लाभ मध्यप्रदेश के ही लोग ले रहे हैं। इस तरह की स्थितियों से निपटने के लिए सरकार को पहले ही प्लान तैयार करना चाहिए, लेकिन समय पर इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।
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जवाबदेही से बची उमा
केंद्रीय मंत्रिमंडल विस्तार में क्षेत्रीय सांसद उमा भारती से जल संसाधन विभाग छीन लिया गया है। शायद उनके लिए यह सुखद साबित होगा। संसदीय दौरा हो या अन्य स्थान पत्रकार उनसे केन-बेतवा से जुड़ा सवाल जरूर पूछते थे। हर बार जवाब रहता, बस जल्द शुरू हो जाएगी योजना। अब ऐसे सवालों से बचना उनके लिए आसान होगा।
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