झांसी। कस्तूरबा गांधी स्कूल में फर्जी प्रमाणपत्र के सहारे 25 जिलों में नौकरी करते पकड़ी गई शिक्षिका के प्रकरण ने एक बार फिर फर्जी दस्तावेज तैयार करने वाले बड़े रैकेट को हवा दे दी है। वहीं, हाल ही में बीयू का एक कर्मचारी भी फर्जी सत्यापन प्रकरण में निलंबित हुआ है। बताया गया कि बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के नाम पर भी हर साल 500 से अधिक फर्जी डिग्री और मार्कशीट बनाई जाती हैं। इसमें एक बड़ा गिरोह पिछले लगभग 30 सालों से काम कर रहा है। गिरोह में बीयू के मौजूदा स्टाफ से लेकर रिटायर हो चुके कर्मचारी तक शामिल हैं। जो कर्नाटका, पंजाब, हरियाणा, बिहार, मध्य प्रदेश, दिल्ली, उत्तर प्रदेश के कई जिलों समेत देशभर के छात्र-छात्राओं से रुपये ऐंठकर फर्जी मार्कशीट, डिग्री बनाते हैं। इन्हीं फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सैकड़ों छात्र सरकारी नौकरी तक पा गए। साल भर में इक्का-दुक्का ही मामले पकड़ में आ पाते हैं।
पिछले साल मार्च में बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के नाम से रमेश कुमार को जारी हुई बीएड की फर्जी डिग्री के फर्जी वेरिफिकेशन के मामले में निलंबित किया गया वीरेंद्र सिंह वर्मा कोई पहला कर्मचारी नहीं है। इससे पहले भी कई कर्मचारियों के नाम प्रकाश में आए। कुछ ने सेटिंग करके जांच दबवा ली तो कुछ पर कार्रवाई हो गई। सूत्रों ने बताया कि बीयू के नाम से फर्जी डिग्री बनाने के पीछे बड़ा रैकेट पिछले 30 सालों से सक्रिय है। गिरोह में बीयू के कुछ मौजूदा चर्चित कर्मचारी और सेवानिवृत्त कर्मी भी शामिल हैं। इन कर्मचारियों के गुर्गे देश के कई राज्यों में एक-दो कमरों में बीयू के नाम से सेंटर खोलकर बैठे हुए हैं। बताया गया कि हर साल बीयू के नाम से पांच सौ से अधिक फर्जी डिग्री और मार्कशीट बनाई जाती हैं। इसमें अधिकारियों के हस्ताक्षर से लेकर फांट, मुहर आदि सबकुछ एक जैसी होती है। एक नजर में देखकर तो कोई फर्जी और असली मार्कशीट में अंतर ही नहीं कर पाएगा। अब तक उच्च स्तरीय जांच न होने की वजह से इस रैकेट का खुलासा नहीं हो सका है।
ऐसे करता है गिरोह काम
गिरोह दो तरह से काम करता है। एक तरीका वो होता है, जिसमें छात्र खुद ही फर्जी मार्कशीट, डिग्री बनवाने के लिए इच्छुक होता है। ऐसे छात्रों से सीधे तीन से चार लाख लाख रुपये की मांग की जाती है। मोलतोल होने पर मामला एक से डेढ़ लाख में सेट हो जाता है। हालांकि, छात्र को यहां यह भी आश्वासन दिया जाता है कि वह इन फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सरकारी नौकरी तक के लिए भी आवेदन कर देगा तो पकड़ में नहीं आएगा। फर्जी दस्तावेज बनवाने के बाद जब छात्र नौकरी में इन्हें लगाता है तो सत्यापन होता है। यहां फिर गिरोह से जुड़े बीयू के कर्मचारी सक्रिय हो जाते हैं और दस्तावेज सही होने की बात लिखकर भेज देते हैं। वर्ष 2014 में बांदा में एक सरकारी शिक्षिका बीयू की फर्जी मार्कशीट के दम पर नौकरी पा भी चुकी है। बाद में उसके किसी रिश्तेदार ने शिकायत की थी तो मामला पकड़ में आ गया था। वहीं, दूसरा तरीका होता है, जो छात्र फर्जी डिग्री, मार्कशीट नहीं चाहते हैं। उन्हें गिरोह के लोग बीयू की फर्जी मार्कशीट पर ऑनलाइन फॉर्म भरवाते हैं। बीयू की कई फर्जी मार्कशीट चल भी रही हैं। इसी कारण कुछ समय पहले बीयू ने अपनी वेबसाइट का डोमेन नेम बदल दिया था। फर्जी वेबसाइट पर प्रवेश दिलाकर किसी सेंटर पर बैठाकर फर्जी परीक्षा कराई जाती है। इसके बाद उन्हें फर्जी मार्कशीट, डिग्री दे दी जाती है।
फर्जीवाड़े के आरोपों की एक साल में भी पूरी नहीं हुई जांच
झांसी। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के गोपनीय अभिलेख विभाग के कर्मचारी के खिलाफ रुपये लेकर बीए प्रथम वर्ष की मार्कशीट पास की जारी करने के आरोपों की जांच एक साल में भी पूरी नहीं हो पाई है। एक भाजपा नेता ने कुलपति को दिए पत्र में यह आरोप लगाते हुए जांच कर कार्रवाई की मांग की थी। बताया गया कि छात्र की प्रथम वर्ष की मार्कशीट आज तक पूरी नहीं हुई है।
बीजेपी नेता ने 18 जुलाई 2019 को कुलपति को दिए पत्र में आरोप लगाया था कि बीयू में कार्यरत कर्मचारी लगभग 25 सालों से लगातार परीक्षा विभाग में कार्यरत रहा। छात्र-छात्राओं की फर्जी अंकतालिकाओं को बनाने के गोरखधंधे में लिप्त है। एक छात्र का उदाहरण देते हुए उन्होंने आरोप लगाया था कि रुपये लेकर पास की मार्कशीट बनाई गई, जबकि अभी तक न तो गोपनीय अभिलेख पूर्ण हैं और न ही परीक्षा अभिलेख। इसी फर्जी अंकतालिका से छात्र ने द्वितीय वर्ष और तृतीय वर्ष की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है लेकिन उपाधि अभी तक निर्गत नहीं की गई है। ऐसे परीक्षाफलों को पूर्ण करने और फर्जी सत्यापनों को सही करने के लिए कर्मचारी ने प्रशासन विभाग में स्थानांतरण गोपनीय विभाग में करा लिया है। जिसकी अब तक जांच पूरी नहीं हो सकी है। कुलपति प्रो. जेवी वैशम्पायन ने बताया कि वह इस प्रकरण को दिखवाएंगे।
डिस्पैच रजिस्टर में नहीं चढ़ाते थे नंबर
झांसी। बीयू में फर्जी सत्यापन के मामले में कई बातें निकलकर सामने आई हैं। सूत्रों ने बताया कि जनसूचना विभाग से सत्यापन होने के बाद डिस्पैच रजिस्टर में जारी किए गए पत्र का नंबर नहीं चढ़ाया जाता था, जिससे यह पता ही नहीं चल पाता है कि कौन सा सत्यापन विभाग की तरफ से भेजा गया और कौन सा बाहर ही बाहर कर दिया गया। जबकि, सत्यापन कर जो पत्र भेजा जाता था, उसमें बकायदा डिस्पैच नंबर होता था।
वर्जन..
सत्यापन में फर्जीवाड़ा न हो, इसलिए ऑनलाइन सत्यापन की व्यवस्था की गई है। अब किसी को भी अपने दस्तावेजों का सत्यापन कराना होगा तो वह ऑनलाइन आवेदन करेगा। दस्तावेज सही है या गलत, इसकी जांच होने के बाद ऑनलाइन ही रिपोर्ट भेजी जाएगी। - प्रो. जेवी वैशम्पायन, कुलपति, बीयू।
ये मामले आ चुके सामने
..............................
केस-1
22 जनवरी 2016 को एक युवक बीए तृतीय वर्ष की मार्कशीट लेकर डिग्री निकलवाने के लिए आया था। एक अधिकारी ने छात्र से प्रथम और द्वितीय वर्ष की मार्कशीट मांगी तो उसने मार्कशीट होने से इंकार कर दिया। इसके बाद युवक को पकड़कर बैठा लिया गया। पूछताछ में युवक ने बताया कि दिल्ली के मुनारिका इलाके में संचालित एक इंस्टीट्यूट संचालक से उसने मार्कशीट बनवाई थी। कॉलेज संचालक ने प्रथम और द्वितीय की मार्कशीट उसे नहीं दी। बाद में वह सेंटर बंद करके भाग गया।
केस-2
जालंधर के लजहत नगर का रहने वाला छात्र एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था। उसका संपर्क बीयू की फर्जी डिग्री, मार्कशीट बनाने वाले गिरोह के सदस्य से हो गया। वर्ष 2014 में उसने विधिवत तरीके से बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के नाम से प्रवेश फार्म भरवाया। प्रवेश दिलाने के बाद परीक्षा भी कराई। इन सबके लिए उसने सवा लाख रुपये लिए। बाद में उसे पास की मार्कशीट पकड़ा दी। अगस्त 2015 में छात्र जब विश्वविद्यालय में मार्कशीट की डुप्लीकेट कॉपी निकलवाने आया तो किसी तरह यह मामला पकड़ में आ गया।