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कोरोना से मरने वालों में 50 फीसदी लोग शुगर और मोटापे का शिकार थे

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कोरोना से मरने वालों में 50 फीसदी लोग शुगर और मोटापे का शिकार थे
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झांसी। कोरोना की दूसरी लहर में 50 फीसदी मौतें तो अकेले डायबिटीज और मोटापा की वजह से हुई हैं। वहीं, तमाम रोगों से ग्रसित मरीजों के देर से मेडिकल कॉलेज पहुंचने की वजह से 20 फीसदी जानें गई हैं। इसके पीछे का कारण कई नर्सिंग होमों में सही इलाज न मिल पाना तो कइयों का समय से अस्पताल में भर्ती न होना रहा।
कोरोना की पहली लहर में 174 मौतें हुई थीं, जबकि, 485 की जान दूसरी लहर में जा चुकी है। ये मौतें सरकारी आंकड़ों में दर्ज हुई हैं। कोरोना के नए स्ट्रेन ने इस बार कोहराम मचा दिया। कई परिवारों में पांच से छह मौतें तक हुईं। वहीं, डॉक्टरों की मानें तो अस्पताल में सबसे ज्यादा मधुमेह पीड़ितों ने कोरोना की चपेट में आने के बाद जान गंवाई। इसका प्रमुख कारण मधुमेह रोगियों की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होना है। ऐसे में कोरोना का हमला होने के बाद वायरस से शरीर लड़ नहीं पाया और रोगियों की सांसें थम गईं। मौतों में दूसरा नंबर मोटापा का आता है। विशेषज्ञों ने बताया कि मोटे मरीजों को निमोनिया होने के बाद ऑक्सीजन ज्यादा जरूरत पड़ती है। ऐसे में उसके पहले जैसी रिकवरी की संभावना काफी कम हो जाती है। इस कारण कई मोटे मरीज तमाम प्रयासों के बावजूद कोरोना से ठीक नहीं हो पाए। इसके अलावा हाइपरटेंशन, ह्रदय व श्वांस रोग की वजह से भी कई मरीजों की जान गई है। जिले के एकमात्र लेवल-3 कोविड अस्पताल मेडिकल कॉलेज में 20 फीसदी मौतें तो देर से अस्पताल पहुंचने के कारण हुई हैं। डॉक्टरों का कहना है कि इनमें से कई मरीज निजी अस्पतालों में इलाज करा रहे थे। वहां सही उपचार न मिल पाने या फिर समय पर अस्पताल में भर्ती न होने की वजह से मरीजों के फेफड़ों को कोरोना ने काफी हद तक क्षतिग्रस्त कर दिया। इसके बाद वो ठीक नहीं हो पाए।
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बीमारी मौतें
मधुमेह 30 प्रतिशत
मोटापा 20 फीसदी
हाइपरटेंशन 10 प्रतिशत
ह्रदय रोगी 5 प्रतिशत
श्वांस रोग 2 प्रतिशत
किडनी 1 प्रतिशत
अन्य 32 प्रतिशत
कोरोना से मरने वालों में 30 फीसदी मधुमेह और 20 प्रतिशत मोटापा का शिकार रहे। आधी मौतें तो इन बीमारियों के कारण ही हुईं। बाकी, हाइपरटेंशन से 10, ह्रदय संबंधी बीमारी से पांच और श्वांस रोग से दो प्रतिशत मरीजों की मौत हुई। - डॉ. रामबाबू सिंह, मेडिसिन विभागाध्यक्ष एवं क्रिटिकल केयर इंचार्ज, मेडिकल कॉलेज।
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मेडिकल कॉलेज में 20 फीसदी से ज्यादा मौतें तो देर से आने की वजह से हुई हैं। डॉक्टरों ने उन्हें बचाने का हर संभव प्रयास किया मगर कॉलेज आने तक उनकी सेहत काफी बिगड़ चुकी थी। हालांकि, कई गंभीर रोगी अस्पताल से ठीक होकर डिस्चार्ज भी हुए। - डॉ. पारस गुप्ता, सहायक नोडल अधिकारी, कोविड, मेडिकल कॉलेज।
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