राजनीति में ऊंचे मुकाम के बाद भी धरातल पर रहे कदम
झांसी। महज ग्यारह वर्ष की आयु में सिर से पिता का साया उठ गया। बावजूद, हिम्मत नहीं हारी। खुद उच्च शिक्षा प्राप्त कर चिकित्सक बने, बल्कि अपने दो भाइयों को भी चिकित्सक बनाया। चिकित्सा को व्यवसाय न मानते हुए सेवा से जोड़ा और समाज की दशा बदलने के लिए राजनीति में आ गए। लोकसभा और बाद में राज्यसभा सदस्य का मुकाम हासिल किया। बावजूद, डा. गोविंद दास रिछारिया धरातल से जुड़े रहे। यही वजह है कि आज भी लोग उन्हें आदर के साथ याद करते हैं।
बुंदेलखंड के एक छोटे से कस्बे बरुआसागर में जन्में डा. गोविंद दास रिछारिया ने चिकित्सा के जरिये समाजसेवा करते हुए 1959 में राजनीति में कदम रख लिया था। शुरुआत में वे लगातार 12 साल तक जिला परिषद के अध्यक्ष रहे। 1971 में वे लोकसभा सदस्य चुने गए। 1980 में खादी ग्रामोद्योग कमीशन के उपाध्यक्ष रहे। जबकि, 1984 में वे राज्यसभा के लिए चुने गए। लेकिन, खास बात ये रही कि राजनीति में अपने ऊंचे कद का उन्होंने आम आदमी को भान नहीं होने दिया। वे लोगों के बीच वैसे ही बने रहे, जैसे सामान्य ग्रामीण परिवेश के लोग रहते हैं। तांगे की सवारी करना और पहनने के लिए कपड़े साथ लेकर चलना। क्योंकि, क्षेत्र में एक बार निकलने पर वे वापस घर 10-12 दिन बाद ही लौटते थे। क्षेत्र में रात किसी के भी घर गुजारकर अगले दिन फिर आगे बढ़ दिए अपने सफर पर।
जरूरतमंद की कागज की पर्ची पर लिखकर सिफारिश कर दी और लग गई नौकरी। जबकि, गलत काम की सिफारिश लेकर आने वाले को पास में भी नहीं फटकने दिया। चाहे वो कितना ही खास क्यों न हो, यही वजह है कि मृत्यु के बाइस साल बाद भी डा. रिछारिया लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाए हुए हैं।
बुंदेला ने दिए थे गैस सिलिंडर
लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य रहने के बावजूद डा. रिछारिया के घर लकड़ी के चूल्हे पर खाना पकता था। उनके पौत्र राहुल रिछारिया ने बताया कि घर में आने जाने वालों का तांता लगा रहता था, मां और दादी का ज्यादातर समय चूल्हे के निकट ही कटता था। एक दिन उन्होंने इस पर आपत्ति जताई।
राहुल ने बताया कि उन्होंने दादा रिछारिया से कहा कि आपके सांसद का प्रति वर्ष चार गैस कनेक्शन का कोटा है। घर के लिए सिलिंडर का इंतजाम क्यों नहीं करते, इस पर उनका जवाब था कि इसके लिए मुझे किसी का हक मारना होगा, जो मैं नहीं कर सकता। घर में इस पर बहस चल ही रही थी कि इसी दरम्यान सुजान सिंह बुंदेला वहां पहुंच गए। जब उन्हें मालूम चला कि घर में गैस नहीं है, तो उन्होंने अपने सांसद कोटे से दो सिलिंडर दिलाए।
शिक्षा पर रहा जोर
1959 से 1971 तक जिला परिषद के अध्यक्ष रहते हुए डा. रिछारिया ने क्षेत्र में डेढ़ हजार से अधिक विद्यालयों की स्थापना कराई। उनका ये कार्य सरकार तक पहुंचा। इस पर उनसे पूछा गया कि उन्होंने किस तरह से जिला परिषद के सीमित संसाधनों में विद्यालय खोल दिए। उन्होंने बताया कि उन्होंने परिषद द्वारा संचालित विद्यालयों की शाखाएं गांव-गांव में खोली हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को शिक्षा हासिल हो सके। इसके लिए समाज का सहयोग भी लिया। खासतौर पर विद्यालय भवन के लिए क्षेत्र के लोगों के भवनों का इस्तेमाल किया। केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि चिकित्सा के क्षेत्र में भी उन्होंने बड़ा काम किया। 1940-50 के दशक में उन्होंने बरुआसागर में 170 बेड का हॉस्पिटल खड़ा कर दिया था।
बीमारी में भी पीड़ित के साथ
वृद्धावस्था में उन्हें लकवा मार गया था। इसमें शरीर के एक भाग ने काम करना बंद कर दिया था। बावजूद, किसी पीड़ित के आने पर वे उसका काम कराने उसके साथ निकल पड़ते थे। इसकी जानकारी वे परिवार के लोगों को नहीं देते थे। चुपके से पीड़ित के साथ चल देते थे और परिजनों को चिंता न हो, इसके लिए वे चिट्टी छोड़ जाते थे।