शिलांग के जंगलों में किसान कर रहे तीन लाख तक कमाई
- आमदनी दोगुनी करने में सिर्फ प्राकृतिक खेती सक्षम: पद्मश्री सुभाष पालेकर
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। पद्मश्री सुभाष पालेकर ने कहा कि प्राकृतिक खेती हजारों साल पुरानी है। करीब पांच हजार साल पहले आबादी बहुत कम थी, इसलिए शिफ्टिंग कल्चर (एक स्थान छोड़कर दूसरे स्थान पर खेती) का चलन था। खूब पैदावार होती थी, तब रसायन अथवा कीटनाशक खेतों में नहीं डाला जाता था। अब जमीन की कमी है। शिलांग के पास जंगलों में पेड़ों के किनारे कली मिर्च, हल्दी, अदरक की खेती प्रयोग के तौर पर हो रही है और काफी सफल है। यहां किसान एक एकड़ जमीन में डेढ़ से तीन लाख रुपये तक कमा रहे हैं।
रानी लक्ष्मीबाई पैरा मेडिकल कॉलेज में शुरू हुए शून्य लागत प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण शिविर में उन्होंने कहा कि शिफ्टिंग कल्चर का प्रयोग मेघालय में शिलांग से 70 किलोमीटर दूर हो रहा है। वहां पर एक हजार एकड़ जमीन पर जंगल है, उसी जंगल की जमीन पर प्रयोग के तौर पर काली मिर्च, हल्दी, अदरक की खेती पेड़ों के किनारे की, इससे चमत्कार हो गया और प्रत्येक किसान डेढ़ लाख से तीन लाख रुपये प्रति एकड़ कमाई कर रहा है। मेघालय, मणिपुर, नागालैंड, सिक्किम समेत पूर्व के सभी राज्यों में खेती के लिए यह पद्धति आम चलन में है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सपना देखा है कि किसानों की आय दोगुनी करेंगे, लेकिन अफसोस कि देश का कोई वैज्ञानिक नहीं बता पाया कि आय दोगुनी कैसे होगी। उन्होंने कहा कि किसान की आय बढ़ाने का एकमात्र जरिया प्राकृतिक खेती है। प्रधानमंत्री भी इसे बढ़ावा दे रहे हैं। रासायनिक खाद से खेती और जैविक खेती दोनों विदेशी हैं। बल्कि, रासायनिक खेती को नई बोतल में पुरानी शराब भरकर जैविक खेती का नाम दिया गया है। जैविक खेती बहुत महंगी है, जो आम किसान के बस की बात नहीं है। जैविक खेती में कंपोस्ट खाद का प्रयोग बताया गया है, इसके जनक ब्रिट्रिश वैज्ञानिक डॉ. अल्वर्ट हावर्ड हैं। खेत में यूरिया डालने से जीवाणु मर जाते हैं, जिससे खेत की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है। जबकि, प्राकृतिक खेती में ऐसा नहीं होता। इसमें पहले साल से ही बढ़िया उत्पादन मिलता है।