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कोरोना से ठीक हुए 20 फीसदी मरीज डायबिटीज की चपेट में

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झांसी। कोरोना से ठीक होने के बाद कई मरीज तमाम बीमारियों की चपेट में आ गए हैं। महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज के शोध में खुलासा हुआ है कि 20 फीसदी रोगी डायबिटीज तो 10 प्रतिशत डिप्रेशन की चपेट में आ गए। पांच फीसदी रोगी ऐसे मिले, जिन्हें अब नींद न आने की बीमारी हो गई है। इन सभी को दवाओं का सहारा लेना पड़ रहा है।
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कोरोना की पहली लहर में गंभीर रूप से बीमार हुए रोगियों पर मेडिकल कॉलेज के नोडल अधिकारी कोविड डॉ. अंशुल जैन, क्रिटिकल केयर इंचार्ज डॉ. रामबाबू सिंह और एनेस्थीसिया विभाग के डॉ. बृजेंद्र वर्मा की टीम ने शोध किया है। टीम ने 18 से 60 साल तक के मरीजों के कोरोना से ठीक होने के एक साल बाद उनकी सेहत की पड़ताल की। इसमें झांसी, ललितपुर समेत बुंदेलखंड के 300 वे रोगी शामिल हैं, जो कि कोविड होने के बाद गंभीर हालत में मेडिकल कॉलेज में भर्ती हुए थे। जांच के दौरान पता चला कि 300 में से 100 ऐसे रोगी थे, जिन्हें पहले से ही डायबिटीज थी। इनमें से कुछ की डायबिटीज अनियंत्रित हुई है। जबकि, 60 लोग (20 प्रतिशत) कोविड से ठीक होने के बाद मधुमेह की चपेट में आ गए। इन रोगियों को कोरोना होने से पहले डायबिटीज नहीं थी। वहीं, 30 मरीज (10 प्रतिशत) ऐसे मिले, जो कोरोना होने के बाद अवसाद का शिकार हो गए हैं। इसके अलावा 15 लोगों (5 प्रतिशत) को समय पर नींद नहीं आने की दिक्कत हो गई है। डायबिटीज, डिप्रेशन और नींद न आने वाले इन रोगियों की दवाएं चल रही हैं। टीम का कहना है कि कोविड की जटिलताओं के कारण लोग मधुमेह का शिकार हुए हैं। इसके अलावा आईसीयू में भर्ती रहने के बाद मशीनों की आवाजों से दिमाग पर असर होता है। इस कारण अनिद्रा, अवसाद हो जाता है।
सांस फूलने की समस्या हो गई दूर
कोरोना होने के बाद कई मरीजों को निमोनिया हो गया था। ऐसे में उन्हें सांस फूलने की समस्या हो गई थी। एक साल बाद अब इन सभी मरीजों की फेफड़े से जुड़ी समस्याएं ठीक हो गई हैं। शोध से पता चला है कि निमोनिया से होने वाली समस्या स्थायी नहीं है।
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मेडिकल कॉलेज में भर्ती हुए झांसी, ललितपुर समेत बुंदेलखंड के 300 कोविड मरीजों पर ठीक होने के एक साल बाद शोध किया गया। इसमें सामने आया है कि 60 मरीज मधुमेह, 30 अवसाद और 15 नींद न आने की बीमारी का शिकार हो गए हैं। इन सभी को दवाओं का सहारा लेना पड़ रहा है। - डॉ. अंशुल जैन, उप प्राचार्य, मेडिकल कॉलेज।
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