‘पंचलाइट’ ने दो दिलों को जोड़ा
झांसी। फणीश्वर नाथ रेणु की मशहूर कहानी ‘पंचलाइट’ का मंचन शनिवार को बीकेडी कॉलेज में हुआ। नाटक में कलाकारों ने प्रेम समन्वय को दर्शाने के साथ ही हास्य प्रसंग प्रस्तुत किए। यह चर्चित कहानी बिहार के एक गांव पर आधारित है।
पंचलाइट की कहानी ‘मैं तो प्रभु की शरनिया जाता हूं, दुनिया छोड़ के’ से शुरू हुई। इस दौरान गांव की पंचायत गांव में पंचलाइट (गैस लालटेन) को खरीदने का निर्णय लेते हैं। रामनवमी के मेले से लालटेन को खरीद लिया जाता है लेकिन उसे किसी को जलाना नहीं आता था। एक पंचायत में लाइट चली जाती है, तब लालटेन मंगाया जाता है पर सभी उसे जलाने से इंकार कर देते हैं। इस दौरान उनमें से एक लालटेन को धीरे से पकड़ने की हिदायत देता है ताकि वह फट न जाए तो दूसरा दूसरे टोले से किसी को बुलाकर उसे जलाने का निर्णय लेते हैं। तब गोधन की याद आती है जो उनके ही गांव का है पर उसका हुक्का-पानी बंद हो जाता है। हुक्का-पानी बंद होने के पीछे प्रेमकथा है। गोधन गांव की ही लड़की मुनरी से प्रेम करता है और दोनों छुप-छुप कर मिलते हैं। एक दिन गांव वाले दोनों को साथ देख लेते हैं। तब पंचायत बैठती है और गोधन का हुक्का पानी बंद कर देती है। उसके प्रेम में लालटेन नया मोड़ देती है, जिसे पंचायत के सामने वह जला देता है। लालटेन जलते ही गांव के लोग और पंचायत नाचने-गाने लगते हैं और उसके प्रेम को कबूल कर लेते हैं।
नाटक में गोधन का किरदार उत्कर्ष ने, मुनरी का स्नेहा, मुनरी की अम्मा का रोल वर्षा ने, सूत्रधार का किरदार ऋषिका बुंदेला ने और पंचो का रोल लक्ष्य गोस्वामी, पुष्पेंद्र और शीनू ने किया। गांव वालों में गगन, नवल और हिमांशु ने किरदार निभाया। सेट डिजाइन नीरज सेन ने किया। ढोलक और हारमोनियम पर धर्मेंद्र और बबलू रहे और लाइट भारत आजाद व म्यूजिक सत्यपाल सिंह ने संभाला। नाटक में मुख्य अतिथि कलाकार आरिफ शहडोली रहे। इस अवसर पर अलख साहू, देवदत्त बुधौलिया, आदित्य रायकवार, कुंती गुप्ता मौजूद रहे।