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कृषि- घट रहा मिटटी का हीमोग्लोबिन--City

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कृषि
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मिट्टी की सेहत में ‘हीमोग्लोबिन’ की कमी
सब हेड -- नाइट्रोजन 0.8 से घट कर रह गई है 0.3 प्रतिशत

- रासायनिक खाद के अंधाधुंध प्रयोग से बीज हो रहा कमजोर
- जांच के बाद किसानों को बांटे जा रहे हैं मृदा स्वास्थ्य कार्ड
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी
हरित क्रांति के बाद खाद्यान्न उत्पादन में तो देश आत्मनिर्भर तो हो गया, परंतु रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग से मिट्टी की सेहत खराब हो गई। खेती के लिए जरूरी मुख्य पोषक तत्व नाइट्रोजन और फास्फोरस की कमी के कारण फसल का दाना (बीज) कमजोर होने लगा है। इसके लिए खेतों के किनारे पक्षी आश्रय स्थल बनाकर व मेड़ पर फूलों के पौधे लगाकर फिर से मिट्टी की सेहत ठीक कर सकते हैं। मिट्टी में नाइट्रोजन की वही भूमिका होती है, जो मनुष्य की शरीर में हीमोग्लोबिन की होती है।
पौधों के बेहतर विकास के लिए 16 प्रमुख पोषक तत्वों की जरूरत होती है। इसमें से तीन पोषक तत्व कार्बन, हाईड्रोजन तथा आक्सीजन वायु मंडल और पानी से मिलते हैं। अन्य 13 पोषक तत्व न्राइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, मैग्नीशियम, कैल्शियम, सल्फर, जिंक, आयरन, कॉपर, मैंगनीज, बोरान, मालीब्डेनम व क्लोरीन जमीन से मिलते हैं। किसानों ने बिना जांच परखे जरूरत से ज्यादा रासायनिक उर्वरकों को खेत में डाला, जिससे प्रमुख पोषक तत्व नाइट्रोजन तथा फास्फोरस की कमी होने लगी। वहीं, पानी की कमी के कारण भूजल स्तर नीचे जाने लगा और खेती के उत्पादन में ठहराव का सा आ गया।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देश पर सभी खेतों की मिट्टी की जांच अनिवार्य कर मृदा स्वास्थ्य कार्ड बनाने का अभियान चलाया जा रहा है। खेतों की मिट्टी की जांच में पता चला है कि नाइट्रोजन 0.8 प्रतिशत से घट कर 0.2 से 0.3 प्रतिशत तक शेष रह गई है। हीमोग्लोबिन की तरह काम करने वाले नाइट्रोजन की कमी हो जाने से फसल का दाना कमजोर हो रहा है। मिट्टी में फास्फोरस 40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर होना चाहिए, जबकि 13- 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रह गया है। इससे दाना उतना पौष्टिक नहीं हो रहा है, जितना होना चाहिए। जड़ों का विकास कम हो रहा है। मिट्टी में सल्फर 15 टीपीएम होना चाहिए, जबकि 9-10 टीपीएम रह गया। सल्फर तिलहनी फसलों में तिल की मात्रा बढ़ाने में काम करता है, इसकी कमी से तिल का उत्पादन प्रभावित हो रहा है।

76,831 नमूने लिए
जिले में 75,618 खेतों से मिट्टी के नमूने लेने का लक्ष्य रखा गया था। इसके सापेक्ष 76,831 नमूने लिए गए। इस तरह 1,98,915 किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड बांट दिए गए।

मिट्टी का नमूना लेने का आधार
सभी खेतों की मिट्टी के नमूने नहीं लिए जाते, बल्कि सिंचित खेतों मेेें 2.50 हेक्टेयर क्षेत्रफल में एक नमूना लिया जाता है। इस क्षेत्रफल में जितने किसान आते हैं, उन सभी के खेतों की मिट्टी की जांच समान होती है। इसी तरह असिंचित खेतों में 10 हेक्टेयर क्षेत्रफल में से एक नमूना लिया जाता है। नमूनों की जांच के बाद उस क्षेत्रफल में जितने किसान आते हैं, उन सभी को मृदा स्वास्थ्य कार्ड में एक जैसी सलाह दी जाती है।

ऐसे भी खराब होती है मिटटी की सेहत
गोबर की खाद का नहीं के बराबर प्रयोग होने से भी मिट्टी की सेहत खराब हो रही है। हार्वेस्टर से फसलों की कटाई के बाद ठूंठ को जला देने, फसल चक्र में ढैंचा व सनई की खेती पर ध्यान नहीं देने, फसल चक्र में दलहनी फसलों को कम से कम पैदा करने, प्रत्येक खेत की मेंड़ बंदी न होने के कारण खेत की उपजाऊ मिट्टी बरसात के पानी के साथ बह जाती है।
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मिट्टी के नमूने लेने का सही समय
किसी खेत की मिट्टी से नमूने लेने के लिए बुवाई अथवा रोपाई से पहले सूखे खेत से मिट्टी का नमूना लेना चाहिए।

सुझावों से किसान को फायदा
मिट्टी की जांच से किसानों को बहुत फायदा हो रहा है। अब वह मृदा स्वास्थ्य कार्ड में दिए गए सुझाव के अनुसार खाद डाल रहे हैं। इससे खेत की सेहत सुधराने में मदद मिलेगी तथा फसल का उत्पादन भी बढ़ेगा।
- नरेंद्र प्रताप सिंह, सहायक निदेशक
क्षेत्रीय भूमि परीक्षण प्रयोगशाला
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