---------
‘रानी झांसी और इंदिरा की शख्सियत एक जैसी’
सब हेड-- स्व. गांधी के जन्म शताब्दी वर्ष पर बोले नेता
- उनके आह्वान पर महोबा के मुढ़ारी गांव की महिलाओं ने दिए थे 62 किलो सोने-चांदी के जेवर
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी।
पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी के जन्म शताब्दी समारोह में पूर्व केंद्रीय मंत्री गुलाम नबी आजाद और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजबब्बर ने झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई और पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी की शख्सियत को एक जैसा बताया। उन्होंने कहा कि दोनों आंधी की तरह आईं और तूफान की तरह चली गईं। उनका जीवन संघर्षों में बीता, लेकिन दोनों की महानता की ऊंचाई कोई छू नहीं सकता। शायद इसीलिए बीबीसी लंदन रेडियो ने 1999 में विश्व भर की सर्वे रिपोर्ट में स्व. गांधी को एक हजार साल की सबसे बड़ी महिला माना था। इंदिरा के आह्वान पर महोबा के मुढ़ारी गांव की महिलाओं 62 किलो सोने-चांदी के जेवर देश के लिए समर्पित कर दिए थे।
पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि स्व. गांधी ने बचपन से लेकर जीवन पर्यंत तक संघर्ष किया। बचपन में उनकी माताजी बीमार रहने लगीं। पिताजी पं. नेहरू देश की आजादी के लिए संघर्ष कर रहे थे, इसलिए जेल में आने-जाने लगे। इस कारण स्व. इंदिरा गांधी उनसे बात तक नहीं कर पाती थीं। वह पत्रों के माध्यम से अपनी बात उन तक पहुंचाती थीं। इस कारण उन्हें अपनी शिक्षा बदल-बदल कर आधा दर्जन स्कूलों में पूरी करनी पड़ी। 1942 में उनकी फिरोज गांधी से शादी हुई और महज पांच महीने में दोनों को भारत छोड़ो आंदोलन के कारण जेल जाना पड़ गया। 1947 से 1969 तक पं. नेहरू प्रधानमंत्री थे। देश-विदेश में पं. नेहरू को बोलने के लिए स्व. इंदिरा गांधी नोट तैयार करने लगीं। इसीलिए उन्हें विदेश नीति की गहरी समझ हो गई थी।
पाकिस्तान से 1965 की लड़ाई के दौरान स्व. गांधी बुंदेलखंड के दौरे पर आई। वह झांसी से महोबा जिला के मुढ़ारी गांव गई थीं, जहां उनके आह्वान पर गांव की महिलाओं ने अपने जेवर उतार कर दे दिए थे। यह जेवर भी कम नहीं थे, बल्कि 62 किलो सोना-चांदी के जेवर लेकर वह विदा हुई थीं। यह उस दौर की बात है जब देश के हालात अच्छे नहीं थे। महारानी लक्ष्मीबाई देश की पहली आजादी के संघर्ष का हिस्सा बनीं तो स्व. इंदिरा गांधी आखिरी आजादी के संघर्ष का हिस्सा बनीं।
प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर ने कहा कि सावरकर राष्ट्रवादी नहीं, बल्कि अवसरवादी थे। इसीलिए तो अंग्रेजों से माफी मांग कर काली पानी की सजा से बरी हुए थे। स्व. गांधी और महारानी लक्ष्मीबाई दोनों महान थीं। दोनों का जन्मदिन 19 नवंबर को हुआ था। अंग्रेजों ने ऐसी इमारतें बनाई थीं कि उन्हें लगता था कि अब हमेशा के लिए भारत में ही रहेंगे, लेकिन पहले महारानी लक्ष्मीबाई फिर स्व. इंदिरा गांधी ने उनकी नींव हिला दी। महारानी के तोपची गुलाम गौस खां थे और सेनापति खुदाबख्श थे। महारानी ने हिंदू-मुस्लिम एकता के महत्व को समझा था। देश की अखंडता के लिए भाईचारा कितना जरूरी था, यह महारानी ने साबित किया था। इसी नक्शेकदम पर स्व. गांधी चलती रहीं। दोनों ने जनता के लिए जीवन की आहुति दे दी।
पं. नेहरू अमीर, पर सादगी से रहे
प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि पं. जवाहरलाल नेहरू अमीर थे, लेकिन वह सादगी से रहते थे। पर, आज गरीब घर में पैदा हुए ‘महोदय’ 15 लाख रुपये का सूट पहनते हैं और स्वयं को गरीब बताते हैं।
कश्मीर से जुड़ी रहीं
पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि स्व. इंदिरा गांधी जब तक जीवित रहीं, उनका कश्मीर से जुड़ाव बना रहा। वह जब तक जीवित रहीं कश्मीर में चिनार के पेड़ को देखने जाती रहीं। इस पेड़ का पत्ता अक्तूबर में हरा से पीला, नवंबर में गहरा पीला इसके बाद लाल हो जाता और झड़ जाता है। इसे देखने के लिए उनका अपने पिता से अक्सर विवाद होता है कि अक्तूबर में जाएंगे या नवंबर में।