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पर्यावरण प्रदूषण का निवाला बने सारस

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पर्यावरण प्रदूषण का निवाला बने सारस
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झांसी। पर्यावरण में लगातार बढ़ते प्रदूषण व समुचित बरसात न होने से पशु-पक्षी बुरी तरह से प्रभावित हैं। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि जिले में सारस की संख्या सिफर हो गई है। जबकि, पहले अक्सर ये नदी, तालाबों में इनके झुंड नजर आते थे। वर्ष 2016 व 2018 की वन विभाग की गणना के अनुसार जिले में एक भी सारस होने की पुष्टि नहीं हुई है।
सारस विश्व का सबसे विशाल उड़ने वाला पक्षी है। इस पक्षी को क्रौंज के नाम से भी जाना जाता है। पूरे विश्व में भारत में ही इस पक्षी की सबसे अधिक संख्या पाई जाती है। सारस भारत के स्थायी निवासी हैं और अक्सर एक ही भौगोलिक क्षेत्र में रहना पसंद करते हैं। ये दलदली भूमि, बाढ़ वाले इलाके, तालाब, झील, धान के खेत व एकांत स्थानों पर ही निवास करते हैं। सारस अपने घोंसले पानी के पास, हरी-भरी घास व झाड़ियों के पास बनाते हैं। घोंसला बनाने में मादा सारस की अहम भूमिका होती है।
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लगातार पर्यावरण में फैले प्र्रदूषण व समुचित बरसात न होने से जिले से सारस पूरी तरह से विलुप्त हो गए हैं। वन विभाग की वर्ष 2018 की गणना के अनुसार जिले में एक भी सारस की पुष्टि नहीं हो सकी है। वन विभाग के वन संरक्षक एके सिंह ने बताया कि नियमानुसार हर साल सारसों की गिनती की जाती है। वन विभाग की टीम द्वारा निर्धारित चार से पांच स्थानों पर ही पहुंच कर सारसों की गिनती होती है। जिसका समय सुबह छह से आठ व शाम चार से छह बजे का होता है। इनमें एक भी सारस को नहीं देखा जा सका है। इनके घोंसले एकांत में होने के कारण नहीं देखा गया है। बताया कि पानी की तलाश में सारस यहां से चले गए हैं।

रामायण में है इनका उल्लेख
रामायण में भी सारस कर वर्णन है। रामायण के अनुसार महार्षि वाल्मीकि सारस के एक जोड़े को देख रहे थे, तभी अचानक एक शिकारी ने तीर से सारस को निशाना बनाया था। तीर के लगते ही एक सारस की मौत हो गई थी। साथी की मौत होते ही दूसरे सारस ने भी अपने प्राण त्याग दिए थे।
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अटूट होता है प्रेम
विशेषज्ञों के अनुसार सारसों में आपस में बड़ा प्रेम होता है। एक बार जोड़े में रहने के बाद ये जीवन भर जोड़े में रहना ही पसंद करते हैं। इसलिये ये अधिकतर जोड़ों में ही देखे जाते हैं।
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