खंभे पर बाकी है रानी के क्रोध के निशान
झांसी। ईस्ट इंडिया कंपनी की दमनकारी नीतियां लगातार बढ़ रहीं थीं। 15 मार्च 1954 को रानी महल में महारानी लक्ष्मीबाई के समक्ष अध्यादेश पढ़ा गया। इसमें ब्रिटिश हुकूमत ने दामोदर राव को दत्तक पुत्र अमान्य करने और झांसी राज्य के अधिग्रहण की घोषणा थी। इस पर क्रोध से तमतमाई रानी ने अपनी झांसी नहीं दूंगी कहते हुए तलवार से निकट के खंभे पर जोरदार प्रहार किया था। उसके निशान आज भी मौजूद हैं।
झांसी से बेहद प्यार करने वाली रानी लक्ष्मीबाई (मणिकर्णिका) का जन्म 19 नवंबर 1834 में हुआ था। पिता मोरोपंत तांबे थे और मां भागीरथी बाई थीं। जन्म के बाद भागीरथी का निधन हो गया। बिठूर में पेशवा के पुत्रों नाना साहेब, राव साहेब के अलावा तात्या टोपे के साथ उन्होंने अस्त्र शस्त्र चलाने का प्रशिक्षण लिया। झांसी राज्य के राजा गंगाधर राव से विवाह के बाद एक पुत्र हुआ, लेकिन वह जल्द ही चल बसा। पुत्र शोक में राजा गंगाधर राव का भी असमय निधन हो गया। रानी ने आनंद राव को दत्तक पुत्र बनाया, जिसका नया नाम दामोदर राव रखा गया लेकिन लार्ड डलहौजी की देशी राज्यों को किसी भी प्रकार से हड़पने की नीति के चलते ब्रिटिश सरकार के अधिकारियों ने झांसी राज्य के अधिग्रहण करने की घोषणा जारी कर दी। इससे क्रोधित रानी ने अपनी तलवार का जोरदार प्रहार रानी महल के दूसरी मंजिल में मौजूद दरबार हाल के खंभे पर किया, जो लगभग आठ इंच कटा है। यह निशान आज भी नजर आता है। पुलिंद कला दीर्घा के अध्यक्ष व झांसी के इतिहास के जानकार मुकुुंद महरोत्रा के अनुसार रानी लक्ष्मीबाई ने इसके बाद युद्ध की तैयारी गोपनीय रूप से शुरू कर दी थी। सन 1858 में उन्होंने झांसी, भांडेर, कालपी आदि क्षेत्रों में अंग्रेजों से युद्ध किया और वह ग्वालियर पहुंचीं थीं। यहां हुसार्स रेजीमेंट से जबरदस्त युद्ध लड़ा और 18 जून 1858 में वह शहीद हो गईं।