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सराफा कारोबारी के कर्मचारियों के पास से 72 लाख रुपये जब्त

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सराफा कारोबारी के कर्मचारियों के पास से 72 लाख रुपये जब्त
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झांसी। शहर की एक सराफा फर्म के चार कर्मचारियों को शुक्रवार की रात जीआरपी ने रेलवे प्लेटफार्म से 72 लाख रुपये के साथ पकड़ लिया। कर्मचारियों के अनुसार वे सभी रुपये लेकर दिल्ली जा रहे थे, जहां उन रुपयों से जेवरात खरीदे जाते। उनके पास रुपयों के लेनदेन से जुड़ा कोई बिल नहीं था। शनिवार को आयकर विभाग की टीम ने रुपये जब्त कर कर्मचारियों के बयान दर्ज किए।
रेलवे स्टेशन पर शुक्रवार की रात जीआरपी थाना प्रभारी अजीत कुमार सिंह टीम के साथ चेकिंग कर रहे थे। करीब 9.30 बजे प्लेटफार्म चार पर उन्होंने दिल्ली जा रहे चार लोगों के सामान की जांच की। चारों के बैग में कपड़ों के बीच कागजों के बंडलों में बंधी नोटों की गड्डियां रखी थीं। हरेक के बैग में 18 लाख 11 हजार छह सौ रुपये रखे थे। कुल 72 लाख 46 हजार चार सौ रुपये थे। चारों को थाने लाया गया। यहां उन्होंने अपने नाम कोतवाली क्षेत्र के बाहर बड़ागांव गेट स्थित ढिमरयाना निवासी गणेश रायकवार, बंगलाघाट निवासी ठाकुर दास प्रजापति, डड़ियापुरा निवासी रामाधार व अंदर बड़ागांव गेट निवासी अवधेश अग्रवाल बताए। उन्होंने बताया कि वह सराफा बाजार स्थित एक प्रतिष्ठान में काम करते हैं। उनके मालिक ने उनको रुपये चांदनी चौक दिल्ली पहुंचाने के लिए दिए थे। वहां उनको एक व्यक्ति को रुपये देने थे, जो बाद में जेवरातों की खरीद कर झांसी भेजता। शनिवार को जीआरपी ने इस मामले की जानकारी आयकर विभाग को दी गई। संयुक्त निदेशक (जांच) आगरा राजेश गुप्ता के आदेश पर झांसी में तैनात आयकर अधिकारी सुनील कुमार द्विवेदी, मनोज पांडे, निरीक्षक प्रदीप सिंह व कर सहायक जितेंद्र कुमार थाने पहुंच गए। इसके बाद चारों कर्मचारियों के बयान दर्ज किए गए। आयकर टीम ने रुपयों की गिनती कराने के बाद उसे जीआरपी के सुपुर्द कर दिया। अब आगरा की टीम झांसी आकर नकदी अपने कब्जे में लेगी। इसके बाद नकदी को सरकारी खजाने में जमा करवा दिया जाएगा। जीआरपी की टीम में वरिष्ठ उपनिरीक्षक अजीत कुमार सिंह, क्यूआरटी प्रभारी पुत्तन लाल प्रजापति शामिल रहे।
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1600 रुपये मिलता है मेहनताना
सराफा कारोबारी के कर्मचारियों ने बताया कि दिल्ली जाने के लिए उनको 1600 रुपये मेहनताना मिलता है। इसमें टिकट और खाने का खर्चा भी शामिल है। अक्सर टीटीई से बात करके बिना टिकट ही ट्रेन में सवार हो जाते हैं। इससे कुछ रुपये बच जाते हैं। शुक्रवार को भी एक कर्मचारी ने जनरल टिकट, दो ने प्लेटफार्म और एक बिना टिकट था। दो कर्मचारी रेल यूनियन की किताब भी अपनी जेब में रखे थे। महीने में तीन से चार चक्कर दिल्ली के लग जाते हैं।
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