अफजल इबादतों में है शबे कद्र की इबादत
झांसी। माहे रमजान के आखरी दस दिनों की पांच रातों में से कोई एक रात शबे कद्र की रात होती है। इस रात में लोग जागकर अल्लाह की इबादत करते हैं। इस्लाम में इस रात को हजार रातों से अफजल बताया गया है। रोजे रखने वालों के अलावा हर कोई इस रात को इबादत कर अल्लाह से दुआ मांगता है।
मुकद्दस रमजान के शुरू होते ही शहर भर की मुस्लिम बस्तियों में रौनक देखने को मिलने लगती है। रमजान का महीना शुरू होते ही हर कोई इबादत करने में मशगूल हो जाता है। इस पाक महीने में सवाब का दर्जा सत्तर गुना अधिक होने के कारण हर कोई लोगों के साथ भलाई करने में जुट जाता है। इस महीने में रोजेदार रोजे रखकर अल्लाह की इबादत करते हैं। इस महीने को अशरों में बांटा गया है। पहले अशरा रहमत, दूसरे को मगफिरत व तीसरे अशरे को जहन्नुम से आजादी का अशरा कहा जाता है। प्रत्येक अशरा दस दिन का होता है।
आखरी अशरे के दस दिनों की ताक रातों (21, 23, 25, 27, 29) में से कोई एक शबेकद्र की रात होती है। यह रात हजार महीनों से बेहतर मानी जाती है। इस रात में मुस्लिम पुरुष मस्जिदों में जाकर अल्लाह की इबादत करते हैं तो महिलाएं और बच्चे घरों में ही इबादत करते हैं। मुफ्ती साबिर कासमी ने बताया कि कुरान में बताया गया है कि तुम्हारे लिए एक महीना रमजान का है, जिसमें एक रात है जो हजार महीनों से अफजल है। कहा कि जो शख्स इस रात से महरूम रह गया वो भलाई और खैर से दूर रह गया। जो शख्स इस रात में जागकर ईमान और सवाब की नीयत से इबादत करता है तो उसके पिछले सभी गुनाह माफ कर दिए जाते हैं। उन्होंने कहा कि यह रात बड़ी बरकतों वाली रात होती है। यह रात बड़ी ही चमकदार होती है व सुबह सूरज बिना किरणों के ही निकलता है। इस रात को मांगी गई दुआ हर हाल में कुबूल होती है।