जिले में परंपरागत खेती को दिया जा रहा प्रोत्साहन
झांसी। खेतों की मिट्टी उपजाऊ और स्वस्थ रहे, इसके लिए अब किसानों को परंपरागत खेती के लिए प्रोत्साहन दिया जा रहा है। परंपरागत कृषि विकास योजना के अंतर्गत 30 कलस्टरों का गठन हुआ है। इसमें शामिल किसानों को अपनी एक - एक एकड़ भूमि में परंपरागत खेती करनी होगी। इसके लिए शासन उन्हें भारी भरकम अनुदान भी देगा।
रसायनिक और उर्वरक कीट नाशक दवाओं के अंधाधुंध उपयोग के कारण बेहतर फसल उत्पादन के लिए खेतों की मिट्टी स्वस्थ नहीं रह गई है। झांसी मंडल के अधिकांश खेतों में जीवाश्म कार्बन की स्थिति अति न्यून स्तर पर पहुंच गई है। खेती योग्य स्वास्थ्य मिट्टी में जीवाश्म कार्बन प्रतिशत 1.0 प्रतिशत होना चाहिए, वह नहीं है। कृषि विभाग के मिट्टी परीक्षण प्रयोगशाला के अनुसार जीवाश्म कार्बन कम होने से पैदावार ठीक नहीं होती है। मंडल के तीनों जिलों में वर्ष 2017 - 18 मेें मिट्टी के 78916 और वर्ष 2018 - 19 में 92142 नमूनों का परीक्षण हुआ। इनमें जीवाश्म कार्बन का प्रतिशत अति न्यून पाया गया। मिट्टी को पुन : स्वस्थ्य किया जाए और उसे खेती योग्य बनाया जाए, इसके लिए शासन स्तर पर कई कदम समय - समय पर उठाए जाते रहे है। इन्हीं में परंपरागत खेती को बढ़ावा देना भी है। इसमें पानी का उपयोग भी कम होता है। परंपरागत खेती में किसानों को मेड़बंदी, नीम क ा तेल, के ंचुआ खाद, गोबर की खाद, हरी खाद आदि के उपयोग का प्रशिक्षण और अनुदान दिया जा रहा है। इसके लिए 30 कलस्टरों का गठन हुआ है। प्रत्येक कलस्टर में 50 - 50 किसान शामिल हैं। कृषि उपनिदेशक उमेश कटियार के अनुसार स्कीम नई है। यह किसानों के लिए लाभदायक है। इससे परंपरागत खेती की ओर रुझान बढ़ेगा।
बाक्स
यह है अनुदान
कृषि विभाग के अनुसार मेड़बंदी के लिए प्रत्येक किसान को एक - एक हजार रुपये तीन वर्ष दिया जाएगा। मेड़बंदी से पानी काफी लंबे समय तक ठहरा रहता है। इसके अलावा बीज के लिए प्रति तीन साल 500 रुपये, जैविक नाइट्रोजन के पौधे लगाने, ढैंचा सनाई आदि के लिए दो हजार रुपये एक बार में, दवा छिड़काव, जैविक दवा बनाने और ड्रम, बाल्टी आदि की खरीद के लिए 1500 रुपये, जैव कीटनाशक, जैव खाद के लिए 500 रुपये, नीम के तेल के लिए 500, फास्फोरस खाद को 1 हजार रुपये, बर्मी कंपोस्ट गड्ढे को 15000 रुपये और यंत्र का किराया उपयोग के लिए 15000 रुपये दिए जाएंगे। चयनित किसानों को प्रशिक्षण भी दिया जाता है और उनके खेतों की मिट्टी का परीक्षण नि:शुल्क होता है। विभाग के अनुसार वर्ष 2015 - 16 में 50 कलस्टरों का गठन हुआ था, जिनसे अच्छे परिणाम प्राप्त हुए थे।