दो बार की हार के बाद कभी झांसी नहीं लौटीं डॉ. नैयर
झांसी। देश की आजादी के बाद चिकित्सक पेशे से राजनीति में प्रवेश करने वाली गांधीवादी डॉ. सुशीला नैयर झांसी से चार बार सांसद रहीं। उनके प्रयास से महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज समेत मिलीं कई उपलब्धियों को कभी भुलाया नहीं जा सकता। आखिरी दो चुनाव लगातार हारने के बाद डॉ. सुशीला नैयर ने अपने समर्थकों के सामने संकल्प लिया था कि वह सियासत के लिए अब कभी झांसी नहीं आएंगी। राजनीति से सन्यास लेने के बाद वह दोबारा कभी झांसी नहीं आईं। वह दोबारा अपने चिकित्सा पेशे में लौट गई थीं।
आजादी के बाद जनता में जाति और मजहब की राजनीति का बस इतना वास्ता माना जाता था कि राजनीतिक दल प्रतिनिधित्व के लिए सभी वर्गों के प्रत्याशी मैदान में उतारते थे। यह कतई नहीं देखा जाता था कि किस क्षेत्र में किस जाति या मजहब के कितने मत हैं। इसकी मिसाल झांसी से बड़ी कौन हो सकती है, जहां पंजाबी और सिखों की कुल आबादी में हिस्सेदारी आधी फीसदी से भी कम थी। इसके बावजूद आजादी के बाद दूसरे ही चुनाव 1957 में कांग्रेस ने झांसी से बिल्कुल अनजान पाकिस्तान में चले गए पंजाब में पैदा हुईं दिल्ली निवासी डॉ. सुशीला नैयर को मैदान में उतार दिया था।
नैयर सन् 1957, 1962 और 1967 में लगातार तीन बार सांसद चुनी गईं। कांग्रेस के दो फाड़ होने पर 1971 के लोकसभा चुनाव में सुशीला नैयर ने इंदिरा गांधी को छोड़कर इंडियन नेशनल कांग्रेस (ऑर्गेनाइजेशन) से चुनाव लड़ा और वह हार गईं। 1977 के चुनाव में आपातकाल के कारण इंदिरा गांधी के खिलाफ चली हवा में जनता पार्टी का दामन थामकर सुशीला नैयर चौथी बार फिर झांसी की सांसद बनीं। डॉ. नैयर के लिए यह जीत वाला अंतिम चुनाव था। इसके बाद नैयर लगातार दो चुनाव 1980 और 1984 में बुरी तरह हार गईं। नैयर को पहले चुनाव 1957 में जनता ने जातपात और मजहब से ऊपर उठकर 66 फीसदी वोट देकर अपना सांसद चुना था। वहीं, 1984 में आखिरी चुनाव में उनको दो फीसदी से कम वोट मिले।
1980 और 1984 के चुनाव में लगातार दो बार की करारी हार ने डॉ. सुशीला नैयर को बेहद विचलित कर दिया। उन्होंने अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा था कि हमने जातपात और मजहब की राजनीति की बजाए मानव सेवा के लिए राजनीति शुरू की थी लेकिन अब इसके मायने बदल गए हैं। ऐसी सियासत से दूर होना चाहती हूं।
अब झांसी से उनका हमेशा के लिए सियासत का रिश्ता टूट गया है। अब वह कभी झांसी नहीं आएंगी। इसके बाद उन्होंने राजनीति से भी सन्यास ले लिया और स्वयं को सदैव के लिए गांधीवादी आदर्श के साथ रोगियों की सेवा में समर्पित कर दिया। तीन जनवरी 2001 को अपनी अंतिम सांस तक वह कभी झांसी नहीं आईं।
मालूम हो कि उनके कार्यकाल के दौरान ही झांसी में रानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज, पारीछा थर्मल पावर प्लांट, भेल, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, नोटघाट पुल समेत कई योजनाओं की स्थापना हुई थी।