चांदपुर-जहाजपुर में पुराने मंदिरों का अस्तित्व खतरे में
ललितपुर। जनपद में विभिन्न प्राचीन स्थलों पर बिखरी पड़ी पुरानी संपदा का कोई रखरखाव नहीं किया जा रहा है। बेतवा नदी किनारे नौवीं से लेकर बारहवीं शताब्दी की धरोहर चांदपुर-जहाजपुर में बने प्राचीन मंदिर अपना अस्तित्व खोने की कगार पर पहुंच गए है। देवी देवताओं की हजारों खंडित प्रतिमाओं का भंडारण यहां के प्राचीन मंदिरों में बिखरा पड़ा है। मूर्ति विहीन और आकर्षक नक्काशी युक्त कई मंदिर धार्मिकता और पर्यटन के महत्व को दर्शाते हैं। इन मंदिरों को पुरातत्व विभाग के मात्र एक बोर्ड का ही संरक्षण प्राप्त है।
विंध्याचल पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित ललितपुर जनपद चंदेल कालीन पुरातत्व एवं प्राचीन संपदाओं के लिए विश्व विख्यात है। धार्मिक किवदंतियों पर आधारित घटनाओं को आधार बनाकर उकेरी गईं प्राचीन मंदिरों में देवी देवताओं की प्रतिमाएं आज भी अपने आप में लोक गाथाओं को संजोए हुए हैं। जनपद में प्राचीन देवगढ़ स्थित दशावतार और नृवराह मंदिर के अलावा दूधई, चांदपुर-जहाजपुर में अपार पुरातत्व संपदाएं बिखरी पड़ी हैं। पुरातत्व विभाग की अपेक्षा की वजह से यह देवस्थल अपना अस्तित्व खोने की कगार पर पहुंच गए है। चांदपुर-जहाजपुर में कुछ एक मंदिरों में ही मूर्तियां विराजमान हैं और वह भी खंडित हो चुकी हैं। जहाजपुर में तला का बाड़ा के दो तरफ के प्राचीन खंडित मंदिर अपने इतिहास की कहानी खुद ही बयां कर रहे है। लाल पत्थरों से बने इन प्राचीन मंदिरों के प्रत्येक द्वार पर देवी-देवताओं की आकर्षण कलाकृतियां बनी हुई हैं। अधिकांश स्थानों पर नंदी और वराह भगवान की मूर्तियां भी अपना अस्तित्व दर्शाती है। तालाब के पीछे की ओर दो मंदिर हैं जहां एक मंदिर के चारों ओर मुख्य द्वार के साथ दीवारों पर गणेश, वराह भगवान के अलावा अन्य देवी देवताओं के साथ ही हाथी घोड़ा और शेर की कलाकृतियां भी बनी हुई हैं, जिनकी भव्यता देखते ही बनती है। यहां पर कम पानी युक्त तालाब के बीचों बीच एक स्तंभ गढ़ा हुआ है, जिस पर भी कलाकृतियां उकेरी गई हैं। वहीं रेल लाइन के दूसरी ओर पश्चिम दिशा में ही पत्थरों की बाउंडरी युक्त आधा दर्जन खंडित मंदिरों का देवस्थान भी स्थित है, जो अपनी बर्बादी की कहानी बयां करता है। इस स्थान पर सैकड़ों वर्ष पूर्व इन पुरानी मंदिरों और उनमें स्थापित प्रतिमाओं का तोड़ा गया होगा। स्थानीय लोगों के अनुसार वह और उनके पूर्वजों द्वारा इन मंदिरों को इसी स्थिति में देखा गया है। इन मंदिरों के चारों ओर बिना शिवलिंग के दर्जनों आधार शिलायुक्त अवशेष भी नजर आते हैं। वहीं यहां विशाल मानवपैर नुमा अधूरी प्रतिमाएं जैसी सैकड़ों प्रतिमाएं भी बिखरी पड़ी हैं। यहां स्थित यह खंडित और मूर्ति विहीन मंदिरों को अब भी पुरातत्व संरक्षण की आवश्यकता है, लेकिन पुरातत्व विभाग ने इनके संरक्षण के नाम पर एक बोर्ड जरूरी लगा रखा है। लेकिन इनके अस्तित्व को संजोने के लिए अब तक गंभीरता के साथ कोई भी प्रयास नहीं किए गए हैं। हर बार शासन द्वारा पुरातत्व को संजोने के लिए वादे तो कर दिए जाते हैं, लेकिन हर बार वादा सिर्फ रूपरेखा तक ही सीमित रह जाता है।
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बुनियादी सुविधाएं कोसों दूर
ललितपुर। जनपद के धौर्रा रेलवे स्टेशन से करीब चार किलोमीटर दूर चांदपुर-जहाजपुर स्थित है। यहां रेलवे गेट के पूर्व की ओर चांदपुर और पश्चिम की ओर जहाजपुर स्थित है। हालांकि दोनों स्थानों पर मात्र रेल पटरियों के बीच का ही फासला है, लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए न तो सड़क मार्ग ही सुगम है और न ही पानी और बिजली की ही कोई व्यवस्था की गई है। कहने को तो यह पुरातत्व महत्व का देवतुल्य स्थान पुरातत्व संरक्षण प्राप्त है, लेकिन यहां न तो मंदिर के इतिहास के बारे में कोई बोर्ड भी नहीं लगाया गया है। कोई प्रचार प्रसार ही किया गया है और न ही मंदिरों के विकास को पहल की गई है। यहां बारिश और धूप से बचाव के लिए भी कोई धर्मशाला या रैन बसेरा का भी कोई इंतजाम नहीं किया गया है।
इनका कहना है
सुविधाएं कराई जाएंगी मुहैया
मंदिरों व मूर्तियों के संरक्षण का कार्य पुरातत्व विभाग का है। क्षेत्रीय पर्यटन विभाग द्वारा शौचालय, यात्री बेंच लगाने, पेयजल और बिजली की व्यवस्था का कार्य किया जाता है। यदि चांदपुर-जहाजपुर में इस प्रकार की कोई कमी है तो बजट मिलने पर शीघ्र यह सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी।
कल्याण सिंह यादव, क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी।