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अल्लाह एक है, हजरत साहब उनके रसूल
- आज से इज्तिमा में देश के विभिन्न स्थानों से आए उलेमा समझाएंगे यह बात
- ईदगाह परिसर में होगा दो दिवसीय आयोजन दस हजार से अधिक लोग शामिल होंगे
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी।
शनिवार सुबह फर्ज की नमाज के बाद ईदगाह में दो दिवसीय इज्तिमा का आगाज होगा। इसमें देश में विभिन्न हिस्सों से आए उलेमा अमन का पैगाम देते हुए बताएंगे कि अल्लाह एक है और हजरत साहब उनके रसूल हैं। कई शहरों से करीब दस हजार से अधिक लोग इसमें शिरकत करेंगे।
ईदगाह के मैदान पर इज्तिमा की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। बाहर से आने वाले अकीदतमंदों के इस्तकबाल के लिए पांडाल भी बनकर तैयार हो चुके हैं। इज्तिमा में उलेमा अल्लाह के रसूल का पैगाम लोगों तक पहंचाने के लिए तकरीर करेंगे। इज्तिमा में पहुंचने लोगों के लिए इंतजाम भी शुरू कर दिए गए हैं। जहां रहने, खाने, नमाज, वजूखाने सहित सभी सुविधाएं रहेंगी। यहां पर पांचों समय की नमाज जमात के साथ अदा की जाएगी। इज्तिमा में बांदा से मुफ्ती जहीर, दिल्ली से मौलाना शौकत, मेवात से मौलाना मेहंदी हसन, राजस्थान से मौलाना एजाज और झांसी से मुफ्ती मोहम्मद इमरान नदवी, मुफ्ती मोहम्मद अफ्फान असअदी, मुफ्ती साबिर अंसारी अपनी-अपनी तकरीर में दीन की बातें करेंगे।
तकरीर में इन पर होगी चर्चा
ईमान: अल्लाह एक है। इसके सिवाय कोई दूसरा माबूद (खुदा) नहीं। हजरत साहब अल्लाह के रसूल हैं। इसका यकीन ही ईमान है। खुदा पर विश्वास ही ईमान है। सबसे पहली मेहनत इसी को लेकर होती है। उलेमाओं के मुताबिक ये यकीन यदि बन गया तो लोग खुद ही बुराइयों से बचने लगेंगे और भलाई के कामों की तरफ बढ़ेंगे।
नमाज: अपने कार्यों को करते हुए खुदा को याद करना। उलेमाओं के मुताबिक नमाज हर एक मुसलमान पर फर्ज है, इसलिए तय समय पर नमाज अदा करना चाहिए। उलेमा बताते हैं कि जब अजान होने लगे तो दुनिया के सभी काम छोड़कर नमाज अदा की जानी चाहिए। ताकि अल्लाह की इबादत हो सके।
इल्म और जिक्र: अच्छाई और बुराई में फर्क कर सकें, इतना इल्म हर एक को जरूरी है। महिलाओं और पुरुषों के लिए इसकी कोई सीमा नहीं है। जितना हो सके, ज्ञान हासिल करना चाहिए। जिक्र यानी अल्लाह को याद करना, हमेशा अल्लाह को याद करो, ऐसा करने से दिलों से बुरे ख्याल निकलेंगे।
इखलास-ए-नियम: आप कोई भी काम करो, इसमें दिखावे या मैं की भावना नहीं होनी चाहिए। कोई भी काम हो इसका मकसद यही हो कि अल्लाह मुझसे खुश हो जाए। फिर वो काम दीनी हो या दुनियावी। उलेमाओं के मुताबिक मदद के दौरान यदि दिखावा की भावना आ गई तो ये फिजूल है।
इकरामे मुस्लिम: बड़ों का अदब, छोटों से प्यार। अपनों से बड़ों के साथ अदब और लिहाज से पेश आएं, उनका ऐहतराम करें, वहीं अपने से छोटों से प्यार से पेश आएं। उन्हें भलाई की सीख दें और बुराई की ओर जाने से रोकें। यदि किसी का पड़ोसी दुखी है तो उसकी इबादत कबूल नहीं होगी। व्यवहार किसी को दुख पहुंचाने वाला न हो।
तब्लीग का वक्त: रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने सभी दिन-रात काम में जुटे रहते हैं। इसके बीच कुछ समय ऐसा हो, जिसमें कुछ नया सीख सकें या जिन्हें नहीं आता उन्हें सिखा सकें। समय के साथ इंसानों में कुछ बुराइयां आ जाती हैं। कुछ समय कुरआन, नमाज और जिक्र के बारे में सीखना चाहिए।
वक्त देना जरूरी
किसी काम को सीखने में वक्त लगता है। जिंदगी गुजारने के लिए जो तरीका बताया गया उसे सीखने के लिए भी वक्त देना जरूरी है, इसी में कामयाबी है। अल्लाह की मर्जी के बिना कुछ नहीं होता ये यकीन होना चाहिए। इसी को बनाने के लिए ये पूरी मेहनत होती है। अगर ये बात दिलों में आ गई तो हम खुद ही बुराइयों से दूर हो जाएंगे।
मुफ्ती साबिर अंसारी, शहर काजी