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शहर ने दिखाई समझदारी, दिवाली पर कम हुआ प्रदूषण

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झांसी। इस दिवाली पर शहर के लोगों ने समझदारी का परिचय दिया। आतिशबाजी का कम इस्तेमाल किया। इससे पिछले साल की तुलना में इस साल वायु प्रदूषण का स्तर कम रहा। ये रिपोर्ट प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से जारी की गई है।

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दिवाली पर आतिशबाजी का कम से कम इस्तेमाल हो, इसके लिए लोगों को लगातार जागरूक किया जा रहा है। इस बार इसका खासा असर देखने को मिला है। इस दिवाली पर पटाखों की धूम कम ही रही थी। धनतेरस और छोटी दिवाली पर पिछले सालों की तुलना में न के बराबर ही पटाखे चलाए गए थे और दिवाली की रात आठ बजे से लेकर ग्यारह बजे तक ही पटाखों का शोर सुनाई दिया था। जबकि, पूर्व के वर्षों में दिवाली की रात दो बजे तक पटाखों की गड़गड़ाहट सुनने को मिलती थी। लोगों में आई इस जागरूकता से पर्यावरण को लाभ हुआ है। पिछले साल की तुलना में इस साल वायु प्रदूषण कम हुआ है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा इसकी गणना कर रिपोर्ट जारी की है।

ये आई कमी
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से दिवाली और उससे पहले शहर में दो स्थानों पर प्रदूषण की गणना की गई। रिहायशी इलाके वीरांगना नगर में पिछले साल दिवाली से दो दिन पहले प्रदूषण का स्तर 82.00 पीएम-10 (धूल का सूक्ष्म से सूक्ष्म कण जो दिखता नहीं है) था, जो इस बार 81.3 रहा। जबकि, पिछले साल यहां दिवाली की रात प्रदूषण का स्तर 212.18 पीएम-10 था, जो इस साल घटकर 203.66 रहा।
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इसी प्रकार भीड़भाड़ वाले इलाके इलाइट चौराहे पर जांच की गई है। यहां भी उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं। पिछले साल दिवाली से दो दिन पहले इलाइट पर प्रदूषण का स्तर 99.9 पीएम-10 था, जो इस साल 95.63 रहा। जबकि, दिवाली की रात पिछले साल इलाइट पर प्रदूषण का स्तर 212.18 था, जो इस साल 203.66 पीएम-10 दर्ज किया गया।

पर्यावरण के लिए सकारात्मक परिणाम
पर्टिकुलर मेटर-10 (पीएम-10) का सामान्य स्तर 100 माना जाता है। आतिशबाजी की वजह से दिवाली पर इसमें दोगुने से अधिक तक की बढ़ोत्तरी हो जाती है। लेकिन, इस साल दिवाली पर पिछले साल की तुलना में इसमें कमी आई है। आतिशबाजी के कम इस्तेमाल की वजह से ये संभव हुआ है। पर्यावरण की दृष्टि से ये सकारात्मक परिणाम हैं।
- डॉ. माधवी कमलवंशी, सहायक वैज्ञानिक अधिकारी - प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड

चालीस फीसदी कम हुई थी बिक्री
पिछले साल की तुलना में इस साल दिवाली पर पटाखों की बिक्री लगभग चालीस प्रतिशत कम रही। लोगों ने धुआं और तेज आवाज वाले पटाखों से परहेज किया। अनार, चकरी जैसी आतिशबाजी की ज्यादा मांग रही। पटाखा बनाने वाली कंपनियों ने भी इस बार कम धुएं वाले पटाखों का उत्पादन किया। ग्राहकों के रुख को देखते हुए उम्मीद है कि आने वाले दिनों में बेहद कम प्रदूषण वाले पटाखे बाजार में आएंगे।
- करन पटवा, थोक आतिशबाजी कारोबारी

सिकुड़ जाती हैं सांस की नलियां
धूल के सूक्ष्म कण (पीएम-10) शरीर के लिए बेहद घातक होते हैं। खासतौर पर अस्थमा रोगियों के लिए ये प्राणघातक साबित हो सकते हैं। इनके संपर्क में आने से उन्हें अस्थमा का अटैक तक पड़ सकता है। जबकि, लगातार संपर्क में रहने से सांस की नलियां सिकुड़ जाती हैं। फेफड़े भी संक्रमित हो जाते हैं। वहीं, तेज आवाज से दिल का दौरा पड़ सकता है। माइग्रेन का दर्द भी हो सकता है। कान के पर्दे को भी नुकसान होता है।
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- डॉ. जकी सिद्दीकी, असिस्टेंट प्रोफेसर - महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कालेज

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