ललितपुर। जिले के बहुचर्चित सैक्स रैकेट कांड में बृहस्पतिवार को न्यायालय द्वारा आठ दोषियों को सजा का एलान किया गया। फैसले के दौरान कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कांड में शामिल पीड़िता के प्रति समाज की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि समाज में कोई भी ऐसा व्यक्ति सामने नहीं आया, जिसने उसकी मदद की हो। यहां तक उसके परिजनों ने भी पीड़ितो को नशा करने के अलाव देर रात घर लौटने तक के बारे में भी नहीं टोका गया। परेशान पीड़िता आत्महत्या करने के साथ ही घर छोड़ने को मजबूूर हो गई। वह तो भाग्यवश उसकी जान बच गई और यह मामला खुल गया।
प्रभारी जिला शासकीय अधिवक्ता बृजेंद्र सिंह यादव ने जानकारी देते हुए बताया कि न्यायालय में पीड़िता द्वारा बयान दिया गया था कि ढाई महीने के पूरे घटनाक्रम में वह अक्सर घर से दिन में करीब डेढ़ बजे निकलती थी और देर शाम को छह से सात बजे तक वापस आ जाती थी। कभी-कभी रात में वापस आती थी। वह अपने घर पर सैक्स रैकेट संचालिका माही सिंह परमार उर्फ छाया सिंह के घर जाने की बात कहकर जाती थी जहां उसका शारीरिक शोषण किया जाता था।
पहली घटना में उसके ऊपर रिवाल्वर रखी गई थी और वीडियो क्लिप बनाई गई थी। तब वह अपने घर सुरक्षित आ गई थी और अपने मां बाप को इस घटना के बारे में कुछ नहीं बताया था। माही लगातार गिफ्ट देती थी, वह घर लाती थी। मां बाप ने पूछा तो बता दिया था कि माही ने दिया है। जब वह घर लौटती थी, तो थोड़ा नशा रहता था, वह मां से मिलती थी, लेकिन मां ने कभी उससे यह नहीं पूछा कि उससे नशे व सिगरेट की खुशबू क्यों आ रही है। कहां नशा किया है, पिता ने भी कभी नहीं पूछा।
जबकि पहली घटना के दिन ही माही की मुलाकात उसकी मां से हुई और उसके बाद माही के कहने पर उसके साथ बर्थडे पार्टी में भेज दिया गया, उसी दिन रात को उसके साथ पहला घटनाक्रम हुआ। जिसके बाद वह वह आधी रात में माही के साथ ही वापस लौटी। इस घटना के बाद जो घटनाक्रम हुए हैं, उनमें वह जब घर से निकली है और रात-रात में घर लौटी है। फिर भी परिजनों ने कभी कोई प्रश्न नहीं किया।
यहां तक उसने यह भी बताया कि यह नहीं कहा जा सकता है कि उसके परिजनों व माही के बीच उसके शारीरिक दोहन के संबंध में कोई वार्ता व अनुबंध हुआ हो। उसके हालातों को जानने के बाद भी किसी ने नहीं रोका टोका। उसके घर से भागने को मुख्य कारण वह अपने परिजनों के व्यवहार और अपने सैक्स रैकेट व शारीरिक दोहन से दुखी थी।
इन परिस्थितियों से बाहर निकलने की कोई आशा नजर नहीं आने पर दुखी होकर उसने आत्महत्या तक को भी सोचा एवं मन के निर्णय की स्थिति में उसने घर छोड़ दिया। यहां तक जहां भी वह गई वहां उसका शारीरिक शोषण किया गया था। ऐसे में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश उमेश कुमार सिरोही ने कहा कि पीड़िता के हृदयमर्मी बयान से समाज की मानसिक विकृति एवं परिजनों की भूमिका स्पष्ट होती है कि वह अपनी 15 वर्षीय बेटी के इस प्रकार की स्थिति से परिचित होते हुए भी सरगना माही के साथ भेज देते हैं और उसके द्वारा लाए गए उपहारों से लाभांवित होते हैं। वहीं दूसरी ओर समाज में जहां जहां पीड़िता गई, वहां-वहां घटनाक्रम में कोई भी ऐसा व्यक्ति सामने नहीं आया, जिसने पीड़िता को किसी प्रकार की मदद की हो। समाज में हर तरफ से परेशान पीड़िता को आत्महत्या तक करने के लिए अपने घर को छोड़ना पड़ गया। कोर्ट ने कहा वह तो भाग्यवश बच और पूरा मामला खुल गया। जिसके बाद दोषियों को मिल सकी।
मोबाइल इंटरनेट तकनीक एक ओर ज्ञान, तो दूसरी ओर अभिशाप
न्यायाधीश ने उक्त मामले में टिप्पणी करते हुए यह भी कहा कि इस मामले में पीड़िता द्वारा साक्ष्य में बताया गया कि वह फेसबुक चलाती थी, फेसबुक पर उसकी दो आईडी हैं, जो उसके नाम से हैं। यहां तक कि सैक्स रैकेट संचालिका द्वारा उसका फर्जी आधार कार्ड तक बनवाया गया था, जिसमें उसे बालिग दर्शाया गया था, जो पूर्ण फर्जी था। यहां तक कि कई सरकारी दस्तावेज फर्जी बनवाए गए हैं और कई नाबालिग लड़कियां भी हैं जिनके फर्जी आधार भी बने होने की संभावना है।
ऐसे में न्यायाधीश ने कहा कि छोटे अपरिपक्व बच्चों को मोबाइल, इंटरनेट आदि की सुविधा उपलब्ध कराने वाले समाज के लिए यह मामला एक सीख के रुप में हो सकता है। जहां तकनीक एक ओर ज्ञान के भंडार को खोलती है, वहीं दूसरी ओर अपरिपक्व बच्चों के लिए अनियंत्रित तरीके से इसका इस्तेमाल करने पर यह भारतीय सामाजिक व्यवस्था पर एक अभिशाप के रुप में प्रभाव उत्पन्न करती है।