डेंगू के मरीजों को प्लेटलेट्स के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है। हवा का रुख भांपते हुए प्राइवेट ब्लड बैंक मरीजों से मनमाने पैसे वसूल रहे हैं। इससे लोगों का हाल बेहाल है। वहीं जिला अस्पताल में फिर से ब्लड कंपोनेंट सेपरेटर मशीन खराब हो गई है। इस मशीन से रक्त के चार तत्व ‘आरबीसी, डब्लूबीसी, प्लेटलेट्स और प्लाज्मा’ बनाए जाते हैं। मशीन खराब होने से अस्पताल में प्लेटलेट्स नहीं हैं।
डेंगू का मच्छर जब काटता है तो वायरस फैल जाता है। ये वायरस प्लेटलेट्स निर्माण की क्षमता को कम कर देते हैं। डेंगू के दौरान यदि रक्त में मौजूद प्लेटलेट्स की संख्या लगातार गिरने लगती है तो इसकी पूर्ति भी प्लेटलेट्स चढ़ाकर की जाती है। डेंगू बुखार बढ़ने पर प्लेटलेट्स तेजी से गिरती हैं। इस स्थिति में ब्लीडिंग शुरू हो जाती है। यदि रक्त में प्लेटलेट्स की मात्रा 40 हजार से कम होती है तो मरीज को प्लेटलेट्स चढ़ानी पड़ती है।
प्लेटलेट्स कम होने से मरीज की मौत भी हो सकती है। मौजूदा समय में जिला अस्पताल के पास डेंगू के मरीजों की जान बचाने के लिए प्लेटलेट्स नहीं हैं। ब्लड कंपोनेंट सेपरेटर मशीन डेढ़ महीने पहले भी खराब हो गई थी। तब अमर उजाला ने इसको लेकर 4 अक्तूबर को खबर प्रकाशित की थी, उस वक्त अस्पताल प्रशासन ने जल्द मशीन सुधरवाने का दावा किया था। कुछ दिनों बाद मशीन सुधर गई थी। अब दोबारा यह मशीन खराब हो गई है। इससे सीधे मरीज प्रभावित हो रहे हैं। प्लेटलेट्स के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है। कई बार प्लेटलेट्स न मिलने पर उनकी जान जोखिम में रहती है।
ब्लड क्लॉटिंग करती है प्लेटलेट्स
प्लेटलेट्स का काम ब्लड क्लॉटिंग है यानी बहते खून पर थक्का जमाना है, जिससे ज्यादा खून न बहे। अगर इनकी संख्या रक्त में 30 हजार से कम हो जाए, तो शरीर के अंदर ही खून बहने लगता है। शरीर में बहते-बहते यह खून नाक, कान, यूरिन आदि से बाहर आने लगता है। कई बार ब्लीडिंग शरीर के अंदरूनी हिस्सों में होने लगती है।
सीएमएस डॉ. बीके गुप्ता का कहना है कि, ब्लड कंपोनेंट सेपरेटर मशीन दोबारा खराब हो गई है। उसे सुधरवाया जा रहा है। जल्द ही मशीन सुधार ली जाएगी।